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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


आइ रोज़ अप टु ओपन टु माइ बिलवेड, एण्ड माइ हैंड्स ड्राप्स विथ मर्ह, एण्ड माइ फिंगर्स-...

(मैं प्रिय की ओर उमंग कर खिल गयी, मेरे हाथों से अगुरु झरने लगा...)

“चाँदनी बहुत है, सब पी न सकोगी... ऐसे में तुम्हीं चाँदनी हो जाओगी।”

"और तुम, भुवन, तुम? तुम भी, लेकिन जम कर नहीं, द्रवित होकर!”

4

कभी रेखा जागी। तब चाँदनी शायद दोनों के सटे हुए चेहरों को लाँघ कर ऊपर उठती हुई फिर खो गयी थी; रात का एक ठण्डा स्पर्श उस खुली जगह से अन्दर आता हुआ दोनों के तपे माथे और गालों को सहला रहा था; रेखा ने एक लम्बी साँस खींच कर उसे पी लिया; उसके जिस हाथ पर भुवन सोया था उसकी उँगलियाँ उसके माथे के उलझे बालों से बड़े कोमल स्पर्श से खेलने लगी, कि वह जागे नहीं; फिर वह दुबारा सो गयी।

कभी भुवन जागा। उसकी चेतना पहले केन्द्रित हुई उस हाथ में जो रेखा के वक्ष पर पड़ा उसकी साँस के साथ उठता-गिरता-उफ़, कितने कोमल आलोड़न से, जिससे भुवन को लगता था कि उसकी समूची देह ही मानो धीरे-धीरे आलोड़ित हो रही है, मानो बहती नाव में वह सोया हो...अवश हाथ, जिन्हें वह हिला भी नहीं सकता, अवश देह, लेकिन एक स्निग्ध गरमाई की गोद में अवश-चाँदनी वह अधिक

पी गया है-'चाँदनी, मदमाती, उन्मादिनी'!...और उस मीठी अवशता को समर्पित वह भी फिर सो गया...।

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