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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


रेखा के भीतर कुछ पुकार उठा, “वही प्राप्ति है, वही प्राप्ति है।” उसने धीरे-से कहा, “जो छिन जा सकता है पर जब है तब सर्वोपरि है, वही आनन्द है।” फिर विषय बदलने के लिए, बिना उत्तर का मौका दिये कहा, “लेकिन गृहस्थ-जीवन में दूसरे स्तर की बात सोचनी चाहिए न - उसका आधार है स्थायित्व, उड़ान नहीं; गृहस्थी की आधार-भूमि पर पैर टेककर आप घूम भी सकते हैं।”

“रेखा जी, इस बात को गुस्ताखी न समझा जाये तो कहूँ कि गृहस्थी के मामले में आपको ऑथारिटी मानने में संकोच भी हो सकता है।”

“सो तो है।” रेखा ने कहा; फिर मानो उसे तभी ध्यान आया हो कि बात हँसी की है, वह हँस दी।

चन्द्र ने चाय के प्याले की तलछट राखदान में उड़ेल कर चायदानी की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, “आप गौरा जी से मिलने चलेंगी?”

रेखा ने चायदानी सँभालते हुए कहा, “लाइये, मैं बना दूँ।” फिर प्रश्न का उत्तर देते हुए, “हाँ, अगर उन्हें बुरा न लगे।”

“वाह, उन्हें क्यों बुरा लगने लगा? भुवन जिस पर-जिसकी इतनी प्रशंसा करते रहे हैं उसे उनकी प्रिय शिष्या न देखना चाहे, यह हो ही नहीं सकता। वैसे बड़ी अच्छी लड़की है-और बड़ी सुन्दर। संगीत में भी रुचि रखती है यह तो आपको मालूम ही है। इण्टेलिजेण्ट भी है, पर ज़रा मुँहज़ोर।”

रेखा ने अनमने-से कहा, “हाँ?”

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