लोगों की राय

उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

390 पाठक हैं

व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“नहीं, यहीं ठीक है, गौरा जी।”

“आप चाय पसन्द करेंगी या काफ़ी?”

रेखा ने हँसकर कहा, “आपने ज़रूर यह भी सुना होगा कि मैं काफ़ी की पियक्कड़ हूँ; पर चाय पिऊँगी।”

गौरा ने तनिक-सा खिंचकर कहा, “भुवन दा ने ही लिखा था कि वह लखनऊ में बराबर काफ़ी हाउस जाते रहे”-मानो कहना चाहती हो, मैंने आपके बारे में कुछ पूछताछ की हो ऐसा न समझें।

रेखा ने वह खिंचाव भाँप लिया। सहसा गौरा के कन्धे पर हाथ रखकर बोली, “बुरा नहीं मानिएगा, गौरा जी; चन्द्र जी तो जर्नलिस्ट हैं न, हर बात का प्रचार करना उनका काम है - मेरे काफ़ी पीने का भी।”

गौरा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

चाय रख कर गौरा ने कहा, “आप बैठिए, मैं चन्द्रमाधव जी को बुला लाऊँ”

रेखा ने कहा, “ऐसी क्या जल्दी है, दो मिनट अकेले बैठे रहेंगे तो कोई हर्ज नहीं होगा-बल्कि अकेले रहना तनिक भी सीख सकें तो फ़ायदा ही हो।”

गौरा ने कुछ विस्मय से उसकी ओर देखा, फिर बैठ गयी। रेखा कुछ कहना चाहती है शायद, और चन्द्रमाधव की उपस्थिति में बात कर सकना किसी को कठिन मालूम हो, यह ज़रा भी अस्वाभाविक नहीं है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book