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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“ओफ़, चन्द्र जी, जिनके तर्क को आप इस रूप में पेश कर रहे हैं वे सुन लें तो।”

“तो आत्म-हत्या कर लें, यही न? लेकिन उसमें क्या बुराई है? आखिर एक भ्रम ही तो नष्ट होगा-माया का एक पुंज? और आत्मा तो अनश्वर है-तब आत्म-हत्या के माने क्या? लेकिन रेखा जी, आप गाना सुनायें ही, तो वही सुनायें जो लखनऊ में.....”

“कौन-सा?”

“वही शरद की रात के बारे में कुछ; उस समय पूरा सुन नहीं पाये थे।”

रेखा ने गौरा की ओर उन्मुख होकर पूछा, “तुम बाँग्ला समझ लेती हो?”

गौरा ने कहा, “थोड़ी बहुत। पढ़कर समझ लेती हूँ, सुनकर थोड़ी अड़चन होती है।”

“तुम नहीं गाती?”

“मैं! मेरी आवाज़ तो....”

“बहुत मीठी है। अच्छा, संगत करोगी तो गा दूँगी।”

“वाह वा!” चन्द्र ने समर्थन किया, “बहुत अच्छा आइडिया है। आपका संगीत भी कभी नहीं सुना गौरा जी!” कह चुकने के बाद सहसा उसे ध्यान आया, गौरा को रेखा तुम कहकर सम्बोधन कर रही है, और गौरा इस पर चौंकी नहीं, मानो यह स्वाभाविक है; उसने सहसा चौकन्ने होकर दोनों की ओर देखा - यह कब, कैसे हो गया? क्या दोनों ने सहज मान लिया कि रेखा बड़ी और गौरा छोटी है और इसलिए - या कि दोनों ने वैसा परिचय बना लिया - लेकिन कब? कब? मिस्टरी, दाई नेम इज़ वुमन...मध्ययुग के सन्त ठीक मानते थे - हर औरत चुड़ैल होती है, झाड़ू पर सवार जादूगरनी, जो आदमी के किये-कराये पर झाड़ू फेर देती है...। उसने फिर कहा, “हाँ, आप दोनों गाइये-बजाइये, मैं अकेला सुनूँगा, एक दोहरे मिरेकल का एकमात्र साक्षी।”

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