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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“और नहीं तो क्या। जीवन जुआ तो है ही, बड़ा भारी जुआ, एण्डलेस गैम्बलिंग मैच?”

गौरा के मुँह पर कोई तीखा जवाब मचल रहा है यह दीख रहा था। रेखा ने कहा, “तुम्हारी बात में कुछ तत्त्व हो सकता है, चन्द्र; लेकिन क्या, इससे शायद तुम्हीं को अचम्भा हो।”

“क्या?”

“यह कि दाँव दोनों खेलते हैं; लेकिन हम अपना जीवन लगाती हैं और आप-हमारा।”

गौरा कुछ शान्त दीखी, वह जो कहना चाहती थी वह भी मानो इस उत्तर में कह दिया गया।

4

चाय से उठकर तीनों फिर बैठक में आ गये। कमरे में कुछ-कुछ अँधेरा था, क्योंकि बाहर बदली घिरने लगी थी; बड़ी हुई उमस से आशा हो रही थी कि शायद वर्षा हो-उस मौसम की पहली वर्षा...कभी-कभी बादल गरज जाते थे।

चन्द्र ने कहा, “अच्छा रेखा जी, अब गाना हो जाये।”

गौरा ने उठ कर छोटी मेज़ पर एक चाँदी का डिब्बा रेखा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “लीजिए।”

गौरा के बढ़े हुए हाथों में एक में डिब्बा, दूसरे में उसका ढक्कन था; लौंग-इलायची उठाते हुए रेखा की दृष्टि उन हाथों पर टिकी थी। सहसा उसने कहा, “बहुत सुन्दर हैं तुम्हारे हाथ-तुम चूड़ी-ऊड़ी नहीं पहनती?”

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