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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


अपूर्व के मकान के पास ही बैलगाड़ियों का एक अड्डा है। उसे वहां की एक घटना याद आ गई। एक जोड़ी बैल जीवनभर बोझ ढोते-ढोते जब अशक्त और बूढे हो गए हो उनके मालिक ने उन्हें कसाई के हाथ बेच दिया। उस रास्ते से वह जब भी गया है, इस घटना को याद करके उसकी आंखों में आंसू आ गए हैं। बैलों के लिए नहीं। लेकिन धन की लालसा में इस सीमा तक बर्बर और निष्ठुर बने मनुष्य के लिए, जो अपने-आपको निंरतर छोटा बनाता जा रहा है।

कमरे के एक कोने में सैकड़ों स्थान पर फटे-पुराने बिछौने पर एक लड़की और एक लड़का अधमरे से पड़े थे। उनके पास जाकर भारती ने उनकी नब्ज देखी। भय के कारण अपूर्व वहां नहीं जा सका। लेकिन दरिद्रता पीड़ित उन दोनों बच्चों की वेदना उसकी छाती में चोट कर गई।

कुछ देर के बाद भारती बोली, “चलिए।”

पंचकौड़ी चुपचाप, उदास मुख लिए खड़ा था। भारती ने स्निग्ध स्वर में फिर कहा, “डरो मत, दोनों अच्छे हो जाएंगे। मैं डॉक्टर और दवा, सबका प्रबंध कर देती हूं।”

उसकी बात पूरी हो ही रही थी कि अपूर्व जेब में हाथ डालकर रुपया निकालने लगा। भारती ने जल्दी से उस हाथ को पकड़कर रोक दिया। पंचकौड़ी की नजर दूसरी ओर थी। वह यह नहीं देख पाया। लेकिन अपूर्व इसका कारण नहीं समझ सका।

भारती ने अपनी अंगिया के जेब से चार आने निकालकर उसके हाथ में देकर कहा, “बच्चों के लिए चार पैसे की मिश्री, चार पैसे का साबूदाना ले आना और बाकी दो आने का दाल-चावल लाकर तुम खा लेना। कल तुम्हारा प्रबंध कर दूंगी।” यह कहकर अपूर्व को साथ लेकर कमरे से निकल आई।

रास्ते में अपूर्व ने पूछा, “आपने मुझे पैसे देने से रोक दिया और स्वयं भी नहीं दिए। यह क्यों?”

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