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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती हंसकर बोली, “मान लेती हूं कि शशि बाबू किसी दूसरी स्त्री को प्यार करते, लेकिन वह उन्हें क्यों प्यार करती? उन जैसे आदमी को जान-बूझकर कोई स्त्री प्यार कर सकती है, इस बात की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। अच्छा, तुम्हीं बताओ, क्या कोई कर सकती है?”
डॉक्टर बोले, “उसे प्यार करना कठिन तो है ही। इसीलिए तो उसे आशीर्वाद देने के लिए मैं रुक गया। मन में विचार आया कि यदि सच्ची शुभकामना में कोई शक्ति हो तो शशि को उसका फल मिले।”
उनकी आवाज में अचानक गम्भीरता आ जाने के कारण भारती ने बहुत देर चुप रहने के बाद पूछा। “शशि बाबू को प्यार करते हो भैया?”
“हां।”
“क्यों?”
“तुम्हें ही क्यों इतना प्यार करता हूं-क्या इसका कारण बता सकता हूं? शायद इसी तरह हो सकता है।”
भारती ने आदर से पूछा, “अच्छा भैया, तुम्हारे लिए क्या हम दोनों एक ही समान हैं? फिर दूसरे ही पल हंसती-हुई बोली, “फिर भी इतने दिनों में अपना मूल्य बहुत पा गई। चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलकर प्रसन्नता पूर्वक उन्हें आशीर्वाद ....नहीं, नहीं प्रणाम कर आऊं।”
डॉक्टर भी हंस पड़े, बोले, “चलो।”
भारती बोली, “भैया, जैसे समुद्र की थाह नहीं है, उसी तरह तुम्हारी भी कोई थाह नहीं है। स्नेह करो, प्यार कहो, तुम्हारे ऊपर निर्भर होकर कुछ भी दृढ़ता से खड़ा नहीं रह सकता, सभी न जाने कहां समा जाते हैं।”
“पहले जो समुद्र की थाह है। इसलिए इस संबंध में तुम्हारी यह उपमा गलत है।”
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