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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


उसे निरुत्तर देखकर भारती बोली, “तुमने कोई उत्तर नहीं दिया भैया? हिंसा की इतनी बड़ी आग को अपने हृदय में जलाकर तुम और चाहे जो कुछ भी करो, देश की भलाई नहीं कर सकोगे।”

डॉक्टर बोले, “तुमसे तो मैंने अनेक बार कहा है कि जो लोग देश की भलाई करने वाले हैं, वे चंदा इकट्ठा करके अनाथ आश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम, वेदांत आश्रम, दरिद्र भंडार आदि तरह-तरह के लोक हितकारी कार्य कर रहे हैं। महान् पुरुष हैं वे। मैं उनकी भक्ति करता हूं। लेकिन मैंने देश की भलाई करने का भार नहीं लिया है, मैंने उसे स्वतंत्र कराने का भार लिया है। मेरे हृदय की आग केवल दो बातों से बुझ सकती है। एक तो अपनी चिता भस्म से, या फिर जिस दिन यह सुन लूंगा कि यूरोप का धर्म, उसकी सभ्यता, नीति, सागर के अतल गर्भ में डूब गई है।”

भारती स्तब्ध रह गई।

वह कहने लगे, “इस विषकुंड का भरपूर सौदा लेकर यूरोप जब समुद्र पार करके पहले पहल व्यापार करने आया था तब उसे केवल जापान पहचान सका था। इसी से आज उसका इतना सौभाग्य है। इसी से आज वह यूरोप के समकक्ष सभ्रांत मित्र बना हुआ है। लेकिन चीन और भारत उसे नहीं पहचान सके। उन दिनों स्पेन का राज्य सारी पृथ्वी पर फैला हुआ था। एक छोटे से जापानी ने स्पेन के एक नाविक से पूछा, “तुम लोगों को इतना अधिक राज्य कैसे मिला?” नाविक ने उत्तर दिया, “बड़ी आसानी से। हम जिस देश को हड़पना चाहते हैं वहां हम पहले बेचने के लिए माल ले जाते हैं। हाथ-पैर जोड़कर उस देश के राजा से मांग लेते हैं थोड़ी-सी जमीन। उसके बाद ले आते हैं पादरी। वह लोग जितने लोगों को ईसाई नहीं बना पाते उससे कहीं अधिक उस देश के प्रचलित धर्म को गाली-गलौज देते हैं। तब लोग बिगड़कर पागल हो जाते हैं और दो-एक को मार डालते हैं। तब हम मंगा लेते हैं अपनी तोप-बंदूकें और सेना। और तत्काल यह प्रमाणित कर देते हैं कि हमारे सभ्य देश के मानव-संहारकारी यंत्र असभ्य देश की अपेक्षा कितने श्रेष्ठ हैं।”-यह कहकर उन्हें विदा करके जापान ने अपने देश में कानून जारी कर दिया कि जब तक सूर्य और चंद्रमा उदित रहेंगे तब तक ईसाई उनके देश में कदम नहीं रखने पाएंगे। रखेंगे तो उन्हें प्राण-दंड दिया जाएगा।

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