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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


साधु कुछ जवाब न देकर चुप बने रहे। राजलक्ष्मी ने फिर पूछा, “लेकिन सेवा करने के लिए सो संन्यासी होने की जरूरत नहीं होती, भाई। तुम्हें यह मति बुद्धि दी किसने, बताओ तो?”

साधुजी ने इस प्रश्न का शायद उत्तर नहीं दिया, क्योंकि, कुछ देर तक किसी की कोई बात सुनने में नहीं आई। दसेक मिनट बाद कान में भनक पड़ी, साधुजी कह रहे हैं, 'जीजी, मैं बहुत ही क्षुद्र संन्यासी हूँ। मुझे यह नाम न भी दिया जाय तो ठीक है। मैंने तो सिर्फ अपना थोड़ा-सा भार फेंककर उसकी जगह दूसरों का बोझ लाद लिया है।”

राजलक्ष्मी कुछ बोली नहीं, साधुजी कहने लगे, “मैं शुरू से ही देख रहा हूँ कि आप मुझे बराबर घर लौटाने की कोशिश कर रही हैं। मालूम नहीं क्यों, शायद जीजी होने की वजह से ही। परन्तु जिनका भार लेने के लिए हम घर छोड़कर निकल आये हैं वे कितने दुर्बल, कितने रुग्ण, कैसे निरुपाय और कितनी संख्या में हैं, यह अगर किसी तरह एक बार जान जातीं, तो उस बात को फिर मन में भी ला नहीं सकतीं।”

इसका भी राजलक्ष्मी ने कुछ उत्तर नहीं दिया; परन्तु मैं समझ गया कि जो प्रसंग छिड़ा है, उसमें अब दोनों के मन और मत के भेद होने में देर नहीं होगी। साधुजी ने भी ठीक जगह पर ही चोट की है। देश की आभ्यन्तरिक अवस्था और उसके सुख, दु:ख, अभाव को मैं खुद भी कुछ कम नहीं जानता; मगर ये संन्यासी कोई भी क्यों न हों, इन्होंने अपनी इस थोड़ी-सी उमर में मुझसे बहुत ज्यादा और घनिष्ठ भाव से सब देखा-भाला है और बहुत विशाल हृदय से उसे अपनाया है। सुनते-सुनते आँखों की नींद आँसुओं में परिवर्तित हो गयी और सारा हृदय क्रोध, क्षोभ, दु:ख और व्यथा से मानो मथा जाने लगा। पीछे की गाड़ी के अंधेरे कोने में अकेली बैठी हुई राजलक्ष्मी ने एक प्रश्न तक नहीं किया, इतनी बात में से एक भी बात में उसने साथ नहीं दिया। उसकी नीरवता से साधु महाराज ने क्या सोचा होगा सो वे ही जानें; परन्तु, इस एकान्त स्तब्धता का सम्पूर्ण अर्थ मुझसे छिपा न रहा।

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