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प्रेमचन्द की कहानियाँ 35

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :380
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9796

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग


'किसी स्त्री से विवाह का प्रस्ताव करना नीति और धर्म के विरुद्ध है?'

'इसे आप विवाह कहकर 'विवाह' शब्द को कलंकित करते हैं। यह बलात्कार है!'

'आप अपने होश में हैं?'

'खूब अच्छी तरह?'

'मैं आपको धूल में मिला सकता हूँ!'

'तो आपकी गद्दी भी सलामत न रहेगी!'

'मेरी नेकियों का यही बदला है, नमकहराम?'

'आप अब शिष्टता की सीमा से आगे बढ़े जा रहे हैं, राजा साहब! मैंने अब तक अपनी आत्मा की हत्या की है और आपके हर एक जा और बेजा हुक्म की तामील की है; लेकिन आत्मसेवा की भी एक हद होती है, जिसके आगे कोई भला आदमी नहीं जा सकता। आपका यह कृत्य जघन्य है और इसमें जो व्यक्ति आपका सहायक हो, वह इसी योग्य है कि उसकी गर्दन काट ली जाय। मैं ऐसी नौकरी पर लानत भेजता हूँ।' यह कहकर वह घर आये और रातों-रात बोरिया-बस्ता समेटकर रियासत से निकल गये; मगर इसके पहले सारा वृत्तान्त लिखकर उन्होंने एजेंट के पास भेज दिया।

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7. रिहर्सल

रिहर्सल शुरू और वाह! वाह! हाय! हाय! का तार बँधा। कोरस सुनते ही ऐक्टर और प्रोप्राइटर और नाटककार सभी मानो जाग पड़े। भूमिका ने उन्हें विशेष प्रभावित न किया था; पर असली चीज सामने आते ही आँखें खुलीं। समाँ बँध गया। पहला सीन आया। आँखों के सामने वाजिदअली शाह के दरबार की तसवीर खिंच गई। दरबारियों की हाजिरजवाबी और फड़कते हुए लतीफे! वाह, वाह, वाह कहना है। क्या वाक्य रचना थी। क्या शब्द-योजना थी, रसों का जितना सुरुचि से भरा हुआ समावेश था तीसरा दृश्य हास्यमय था हँसते-हँसते लोगों की पसलियाँ दुखने लगीं, स्थूलकाय स्वामी की संयत अविचलितता भी आसन से डिग गई, चौथा सीन करुणाजनक था। हास्य के बाद करुणा, आँधी के बाद आने वाली शांति थी। विनोद आँख पर हाथ रखे सिर झुकाए जैसे रो रहे थे। मस्तराम बार-बार ठंडी आहें भींच रहे थे। और अमरनाथ बार-बार सिसकियाँ भर रहे थे। इसी तरह सीन पर सीन और अंक पर अंक समाप्त होते गए, यहाँ तक कि जब सिहर्सल समाप्त हुआ, तो  दीपक जल चुके थे।

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