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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


चर्चा करके मैंने बहनो को समझाया कि उन्हे बच्चो को व्याकरण नहीं, बल्कि रहन-सहन का तौर तरीका सिखाना है। पढना-लिखना सिखाने की अपेक्षा उन्हें स्वच्छता के नियम सिखाने है। उन्हें यह भी बताया कि हिन्दी, गुजराती, मराठी के बीच कोई बड़ा भेद नहीं है, और पहले दर्जे में तो मुश्किल से अंक लिखना सिखाना है। अतएव उन्हें कोई कठिनाई होगी ही नहीं। परिणाम यह निकला कि बहनो की कक्षाये बहुत अच्छी तरह चली। बहनो में आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने काम में रस भी आने लगा। अवन्तिकाबाई की पाठशाला आदर्श पाठशाला बन गयी। उन्होंने अपनी पाठशाला में प्राण फूँक दिये। इस बहनो के द्वारा गाँवो के स्त्री-समाज में भी हमारा प्रवेश हो सका था।

पर मुझे पढ़ाई की व्यवस्था करके ही रुकना नहीं था। गाँवो में गंदगी की कोई सीमा न थी। गलियो में कचरा, कुओं के आसपास कीचड़ और बदबू, आँगन इतने गंदे कि देखे न जा सके। बड़ो को स्वच्छता की शिक्षा की जरूरत थी। चम्पारन के लोग रोगो से पीडित देखे जाते थे। जितना हो सके उतना सफाई का काम करके लोगों के जीवन के प्रत्येक विभाग में प्रवेश करने की हमारी वृत्ति थी।

इस काम में डॉक्टरो की सहायता की जरूरत थी। अतएव मैंने गोखले की सोसायटी से डॉ. देव की माँग की। उनके साथ मेरी स्नेहगांठ तो बंध ही चुकी थी। छह महीनो के लिए उनकी सेवा का लाभ मिला। उनकी देखरेख में शिक्षको और शिक्षिकाओ को काम करना था।

सबको यह समझा दिया गया कि कोई भी निलहो के विरुद्ध की जाने वाली शिकायतो में न पड़े। राजनीति को न छुए। शिकायत करनेवालो को मेरे पास भेज दे। कोई अपने क्षेत्र से बाहर एक कदम भी न रखे। चम्पारन के इन साथियो का नियम-पालन अद्भूत था। मुझे ऐसा कोई अवसर याद नहीं आता, जब किसी ने दी हुई सूचनाओ का उल्लंघन किया हो।

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