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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


मैंने दिन के दो भाग कर दिये थे। एक भाग मैं दक्षिण अफ्रीका के काम के सिलेसिले में कलकत्ते में रहनेवाले नेताओं से मिलने में बिताता था, और दूसरा भाग कलकत्ते की धार्मिक संस्थाये और दूसरी सार्वजनिक संस्थाये देखने में बिताता था।

एक दिन बोअर-युद्ध में हिन्दुस्तानी शुश्रषा-दल में जो काम किया था, उस पर डॉ. मलिक के सभापतित्व में मैंने भाषण किया। 'इंलिश मैन' के साथ मेरी पहचान इस समय भी बहुत सहायक सिद्ध हुई। मि. सॉंडर्स उन दिनो बीमार थे, पर उनकी मदद तो सन् 1896 में जितनी मिली थी, उतनी ही इस समय भी मिली। यह भाषण गोखले को पसन्द आया था और जब डॉ. राय ने मेरे भाषण की प्रशंसा की तो वे बहुत खुश हुए थे।

यों, गोखले की छाया में रहने से बंगाल में मेरा काम बहुत सरल हो गया था। बगाल के अग्रगण्य कुटुंबो की जानकारी मुझे सहज ही मिल गयी और बंगाल के साथ मेरा निकट संबंध जुड़ गया। इस चिरस्मरणीय महीने के बहुत से संस्मरण मुझे छोड़ देने पड़ेगे। उस महीने में मैं ब्रह्मदेश का भी एक चक्कर लगा आया था। वहाँ के फुंगियो से मिला था। उनका आलस्य देखकर मैं दुःखी हुआ था। मैंने स्वर्ण-पैगोड़ा के दर्शन किये। मंदिर में असंख्य छोटी-छोटी मोमबत्तियाँ जल रही थी। वे मुझे अच्छी नहीं लगी। मन्दिर के गर्भगृह में चूहों को दौड़ते देखकर मुझे स्वामी दयानन्द के अनुभव का स्मरण हो आया। ब्रह्मदेश की महिलाओ की स्वतंत्रता, उनका उत्साह और वहाँ के पुरुषों की सुस्ती देखकर मैंने महिलाओ के लिए अनुराग और पुरुषो के लिए दुःख अनुभव किया। उसी समय मैंने यह भी अनुभव किया कि जिस तरह बम्बई हिन्दुस्तान नहीं हैं, उसी तरह रंगून ब्रह्मदेश नहीं हैं, और जिस प्रकार हम हिन्दुस्तान में अंग्रेज व्यापारियों के कमीशन एजेंट या दलाल बने हुए हैं, उसी प्रकार ब्रह्मदेश में हमने अंग्रेजो के साथ मिलकर ब्रह्मदेशवासियो को कमीशन एजेंट बनाया है।

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