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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


भाई को यह बात मैं शीध्र ही समझा न सका। पहले तो उन्होंने मुझे कड़े शब्दों में उनके प्रति मेरा धर्म समझाया, 'तुम्हें पिताजी से अधिक बुद्धिमान नहीं बनना चाहिये। पिताजी ने जिस प्रकार कुटुम्ब का पोषण किया, उसी प्रकार से तुम्हें भी करना चाहिये ' आदि। मैंने उत्तर में विनय-पूर्वक लिखा कि मैं पिता का काम कर रहा हूँ। कुटुम्ब शब्द का थोड़ा विशाल अर्थ किया जाय, तो मेरा निश्चय आपको समझ में आ सकेगा।

भाई ने मेरी आशा छोड़ दी। एक प्रकार से बोलना ही बन्द कर दिया। इससे मुझे दुःख हुआ। पर जिसे मैं अपना धर्म मानता था उसे छोड़ने से कही अधिक दुःख होता था। मैंने कम दुःख सहन कर लिया। फिर भी भाई के प्रति मेरी भक्ति निर्मल और प्रचंड बनी रही। भाई का दुःख उनके प्रेम में से उत्पन्न हुआ था। उन्हें मेरे पैसों से अधिक आवश्यकता मेरे सद्व्यवहार की थी।

अपने अंतिम दिनों में भाई पिघले। मृत्युशय्या पर पड़े-पड़े उन्हें प्रतीति हुई कि मेरा आचरण ही सच्चा और धर्मपूर्ण था। उनका अत्यन्त करुणाजनक पत्र मिला। यदि पिता पुत्र से क्षमा माँग सकता है, तो उन्होंने मुझसे क्षमा माँगी हैं। उन्होंने लिखा कि मैं उनके लड़को का पालन पोषण अपनी रीति नीति के अनुसार करुँ। स्वयं मुझ से मिलने के लिए वे अधीर हो गये। मुझे तार दिया। मैंने तार से ही जवाब दिया, 'आ जाइये।' पर हमारा मिलन बदा न था।

उनकी अपने पुत्रों संबंधी इच्छा भी पूरी नहीं हुई। भाई ने देश में ही देह छोड़ी। लड़को पर उनके पूर्व-जीवन का प्रभाव पड़ चुका था। उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मैं उन्हें अपने पास खींच न सका। इसमें उनका कोई दोष नहीं था। स्वभाव को कौन बदल सकता हैं? बलवान संस्कारों को कौन मिटा सकता है? हमारी यह धारणा मिथ्या हैं कि जिस तरह हममे परिवर्तन होता है या हमारा विकास होता है, उसी तरह हमारे आश्रितो अथवा साथियों में भी होना चाहिये।

माता-पिता बनने वालों की जिम्मेदारी कितनी भयंकर हैं, इसका कुछ अनुभव इस दृष्टांत से हो सकता हैं।

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