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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


इस अध्याय को समाप्त करने से पहले प्रतिज्ञा के अर्थ के विषय में कुछ कहना जरुरी हैं। मेरी प्रतिज्ञा माता के सम्मुख किया हुआ एक करार था। दुनिया में बहुत से झगडे केवल करार के अर्थ के कारण उत्पन्न होते हैं। इकरारनामा कितनी ही स्पष्ट भाषा में क्यो न लिखा जाये, तो भी भाषाशास्त्री 'राई का पर्वत' कर देंगे। इसमे सभ्य-असभ्य का भेद नहीं रहता। स्वार्थ सबको अन्धा बना देता हैं। राजा से रंक तक सभी लोग करारों के खुद को अच्छे लगने वाले अर्थ करके दुनिया को, खुद को और भगवान को धोखा देते हैं। इस प्रकार पक्षकार लोग जिस शब्द अथवा वाक्य का अपने अनुकूल पड़नेवाला अर्थ करते हैं, न्यायशास्त्र में उसे द्वि-अर्थी मध्यपद कहा गया हैं। सुवर्ण न्याय तो यह हैं कि विपक्ष ने हमारी बात का जो अर्थ माना हो, वही सच माना जाये ; हमारे मन में जो हो वह खोटा अथवा अधूरा हैं। और ऐसा ही दूसरा सुवर्ण न्याय यह है कि जहाँ दो अर्थ हो सकते हैं वहीँ दुर्बल पक्ष जो अर्थ करे, वही सच माना चाहिये। इन दो सुवर्ण मार्गों का त्याग होने से ही अक्सर झगडे होते है और अधर्म चलता हैं। और इस अन्याय की जड़ असत्य हैं। जिसे सत्य के ही मार्ग पर जाना हो, उसे सुवर्ण मार्ग सहज भाव से मिल जाता हैं। उसे शास्त्र नहीं खोजने पड़ते। माता ने 'माँस' शब्द का जो अर्थ माना औऱ जिसे मैंने उस समय समझा, वही मेरे लिए सच्चा था। वह अर्थ नहीं जिसे मैं अपने अधिक अनुभव से या अपनी विद्वत्त के मद में सीखा-समझा था।

इस समय तक के मेरे प्रयोग आर्थिक और आरोग्य की दृष्टि से होते थे। विलायत में उन्होंने धार्मिक स्वरुप ग्रहण नहीं किया था। धार्मिक दृष्टि से मेरे कठिन प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में हुए, जिन की छानबीन आगे करनी होगी। पर कहा जा सकता हैं कि उनका बीज विलायत में बोया गया था।

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