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जीवनी/आत्मकथा >> रवि कहानी

रवि कहानी

अमिताभ चौधुरी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :130
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9841

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रवीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी


रवि कहानी

एक

रवीन्द्रनाथ को अस्सी साल की लंबी उम्र मिली थी। उनका जीवन दु:ख-सुख से भरा था। उसी के बीच में लिखते-पढ़ते भी रहे। जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में सन् 1861 में उनका जन्म हुआ था। उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार का बल्कि बंगाल और पूरे देश का नाम रोशन किया। उनके पिता और दादा दोनों ही जाने-माने लोग थे। इनके अलावा भी उनके परिवार में ऐसे ही लोग और भी थे। मगर रवीन्द्रनाथ इन सबसे आगे बढ़ गए। उनका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। उनको समझने और जानने के लिए उस समय के इतिहास की जानकारी जरूरी है, इसके अलावा उनके पुरखों के बारे में भी जानने की जरूरत है। जसोर जिले से कलकत्ता आकर उनके एक पुरखे ने किस तरह खूब धन कमाया तथा उनके बाद उनकी आने वाली पीढ़ी ने परिवार का नाम रोशन किया, यह कहानी जितनी रोचक है उतनी ही चौंकाती भी है। रवीन्द्रनाथ की सात पीढ़ी पहले उनके पुरखे पंचानन से यह कहानी शुरू होती है।

पंचानन कुशारी जसोर जिले से अपनी किस्मत आजमाने कलकत्ता आए थे। उन दिनों इस देश में अंग्रेजों ने अपना व्यापार शुरू ही किया था।

सन् 1690 ईसवी में जॉब चार्नक नामक एक अंग्रेज इस देश में आए थे। उसके कुछ साल बाद ही जसोर के पीठाभोग नामक गांव से सूतानुटी अंचल में गंगातट पर पूजा-पाठ कराने के लिए कुशारी महोदय का आगमन हुआ। लोग उन्हें ''ठाकुर महाशय'' कहने लगे, जिस तरह के बाकी दूसरे पुरोहितों को कहते थे। तभी से उनका नाम पंचानन ठाकुर पड़ गया। बाद में उनकी आने वाली पीढ़ी के साथ यही पदवी जुड़ गई।

पूजा-पाठ करने के साथ-साथ ठाकुर महाशय घाट पर खड़े जहाजों के कप्तानों के साथ थोड़ा बहुत लेन-देन का कारोबार भी करने लगे। इससे उनकी अच्छी आमदनी होने लगी। कई साल बाद उनके पास खूब पैसा हो गया।

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