उपन्यास >> आशा निराशा आशा निराशागुरुदत्त
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जीवन के दो पहलुओं पर आधारित यह रोचक उपन्यास...
‘‘यह ठीक है। मैं इस बार तो सर्दी की ऋतु में भी यहां रहने का विचार बना चुकी हूं। तेज के पिता इस निश्चय से प्रसन्न है।’’
यशोदा रात के भोजन के समय तक वहां रही। अनेकानेक विषयों पर वार्त्तालाप हुआ, परन्तु न तो मैत्रेयी ने तेजकृष्ण के विषय में पूछा और न ही यशोदा ने बताया।
रात के नौ बजे यशोदा ने उठते हुए कहा, ‘‘मैं कल सारा दिन और परसों मध्याह्न तक यहां हूं। यदि कल होटल में आ सको तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।’’
मैत्रेयी ने दो क्षण तक विचार किया और कह दिया, ‘‘मैं मध्याह्नोत्तर चाय के समय आऊंगी और यदि आपको असुविधा न हुई तो रात के भोजन तक आपकी संगत में रहूंगी।’’
भारत-चीन का युद्ध हो चुका था और विश्व के सब सामर्थ्यवान् देशों की रुचि उस युद्ध के परिणामों की ओर लगी थी। चीन का बढ़ते-बढ़ते हिन्द महासागर के तट पर आ सकना अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों के लिये चिन्ता का विषय बन रहा था।
मैत्रेयी भी अपने देश के भले-बुरे में रुचि रखते हुए इस युद्ध में भारत के समाचारों से चिन्तित थी। इंगलैंण्ड में रहने वाले भारत के हिन्दू नागरिकों ने भारत की सहायता के लिये धन भेजने का आयोजन किया था। मैत्रेयी ने भी पचास पौण्ड उसमें अपना भाग भेजा था।
यशोदा ने अगले दिन का समाचार बताया, ‘‘युद्ध के आरम्भ होने से पूर्व तेजकृष्ण का एक पत्र किसी अज्ञात स्थान से आया था और उसमें उसने लिखा था कि युद्ध अवश्यवभावी है, परन्तु यह युद्ध निर्णयात्मक नहीं होगा। एक सीमा तक तो यह चल सकेगा और यदि उस सीमा से यह आगे जाने लगा तो यह विश्व युद्ध का रूप धारण कर लेगा और तब चीन तथा उसके सहयोगी रूस की पराजय अवश्यभावी है। बहुत रक्तपात होगा। सम्भव यह भी है कि भूमण्डल की जनसंख्या में भारी कमी हो जाये।
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