लोगों की राय

उपन्यास >> आशा निराशा

आशा निराशा

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7595

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

203 पाठक हैं

जीवन के दो पहलुओं पर आधारित यह रोचक उपन्यास...


‘‘भारत और पाकिस्तान में युद्ध का रूप भी यह नहीं रह सकता। यह सब उस अवस्था में ही होगा जब चीन के शासक अपनी महत्त्वाकांक्षा को सीमा में न रख सके।’’

मैत्रेयी कुछ अपने विचार भी रखती थी, परन्तु तेजकृष्ण के पत्र पर समालोचना न करने के विचार से वह चुप रही और फिर भारत के अन्य विषयों पर वार्तालाप होती रही।

मैत्रेयी ने कहा, ‘‘भारत, जैसा यहां विख्यात हो रहा है, द्रुत गति से उन्नति कर रहा था, परन्तु चीन के साथ युद्ध से इसकी प्रगति में भारी विघ्न पड़ा है।

‘‘भारत की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा वहां एक भारी संख्या में मुसलमानों का होना है। भूमण्डल के उन सब देशों की अवस्था अच्छी नहीं और निकट भविष्य में अच्छी होती दिखाई नहीं देती जहां-जहां मुसलमान शासक के रूप में विद्यमान हैं।’’

‘यशोदा ने कहा, ‘‘हम इसका अर्थ समझे हैं कि इस्लाम पनपता ही उन देशों में है जो पिछड़े हुए है।’’

‘‘परन्तु वे सब देश चाहे तो स्वतन्त्र हैं अथवा स्तन्त्रता के किनारे पर खड़े हैं, कुछ ऐसी ही दिशा में है जो उन्नति के लिये साधन रखते हुए भी प्रगति नहीं कर रहे।

‘‘उनके मार्ग में बाधा उनका मज़हब है। उन्हें या तो मज़हब को छोड़ना होगा, अन्यथा प्रगति की दौड़ में दूसरों से पीछे ही रहना होगा।’’

यशोदा आक्सफोर्ड में पूरे दिन रह कर हवाई जहाज से लन्दन लौट गयी और मैत्रेयी पुनः अपने ‘रिसर्च कौसिंल’ में ‘वाईला-वोसा’ की तैयारी करने लगी। छः सौ ‘फुलस्केप शीट’ पर टाईप किया शोध-प्रबन्ध उसने स्वयं लिखा था और उसमें संशोधन किया था। इस पर भी वह उसको बार-बार पढ़कर उसमें होने वाले संशयों के विषय में मनन और चिन्तन कर रही थी।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book