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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


ज्ञानस्वरूप ने अपनी सास और श्वसुर के चरण-स्पर्ण किये और फिर कहा, ‘‘पिताजी! आज के निमंत्रण का मैं यह अर्थ समझ रहा हूँ कि आपने मन में हमारे प्रति रोष कम हो रहा है।’’

रविशंकर ने ज्ञानस्वरूप के कथन का उत्तर देने के स्थान उनका परिचय अपने मित्र से कारना आरम्भ कर दिया। उसने बताया– ‘‘यह है मेरी लड़की प्रज्ञा; डब्बल एम. ए. है। परन्तु अपने विवाह में किसी बड़े से राय करनी चाहिए, यह इसे विदित नहीं।’’

‘‘और यह हैं इसके पति मिस्टर मुहम्मद यासीन उर्फ ज्ञानस्वरूप; और यह हैं प्रज्ञा की सास मुसम्मात सरवर; और यह कि इसकी ननद है नगीना।’’

इस समय तक सब बैठ गये थे। पाचक सब के लिए जलजीरा ले आया था और सब उससे अपने-अपने लिए लेकर पीने लगे थे। इसके उपरान्त रविशंकर ने विष्णुसहाय का परिच करा दिया–

‘‘आप है डाक्टर विष्णुसहाय एम.ए., पी-एच.डी, रिटायर्ड प्राध्यापक दिल्ली विश्वविद्यालय।’’

रविशंकर ने एक चुस्की जलजीरे की लेते हुए आगे कहा, ‘‘मेरे बरखुरदार उमाशंकर जो पाँच वर्ष तक अमेरिका में मैडीसिन पढ़ कर आये हैं, ने अपनी बहिन इत्यादि को आमंत्रित किया था। मैंने उचित समझा है कि प्रज्ञा डब्बल एम.ए. होने के अभिमान को भंग करने के लिए इससे अधिक शिक्षित व्यक्ति को बुला लूँ। इस कारण विष्णुजी! आपको आने का कष्ट दिया है।’’

विष्णुसहाय जलजीरे का गिलास हाथ में लिए सरुकियां लगा रहा था। इस परिचय के उपरांत उसने पूछा, ‘‘परन्तु रविशंकर जी! किसी युवक अथवा युवती के अपने पर अभिमान को चूर-चूर करने से आपको क्या मिलेगा?’’

यह प्रश्न तो विष्णुसहाय ने रविशंकर से किया था, मगर प्रज्ञा ने एक प्रश्न और कर दिया, ‘‘और डाक्टर साहब! यह भी पिताजी से पूछ लीजिये कि कहीं अभिमान का होना भ्रम तो नहीं है?’’

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