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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


‘‘जो भी नगीना से शादी करना चाहेगा। यह कारोबार नगीना के घरवाले के लिए ही था। ख्याल था कि तुम्हारी उससे शादी हो सकेगी। वह तुम दोनों ने मंजूर नहीं की। इसलिए यह कारोबार उस शख्स के लिए है जो नगीना से विवाह करेगा। वह मकान भी उसी के लिए होगा।’’

‘‘तो अब्बाजान! एक बात करिये। आप बम्बई में जो कारोबार मेरे लिए तजवीज़ कर रहे हैं, उसकी लिखा-पढ़ी करा दीजिए। फिर मैं यहाँ का हक-हकूक छोड़ दूँगा।’’

‘‘मगर यह तो तुम वहाँ चलकर ही फैसला कर सकते हो?’’

‘‘तो ठीक है। जिस दिन मेरी जमानत ‘वैकेट’ होगी, उसी दिन मैं बम्बई आऊँगा। जिसने मेरी और नगीना की बीस-बीस हजार की ज़मानत दी है, वह यह पसन्द नहीं करेगा कि उसकी नजर से ओझल हो जाऊँ। इस वास्ते आपकी इस तजवीज़ पर विचार तो जमानत उठ जाने पर ही हो सकेगा।’’

‘‘तुम यहाँ का काम छोड़ने पर तैयार रहो और मैं वहाँ कारखाने का बन्दोबस्त कर रखूँगा।’’

‘‘करिये! मुझे आपका हुक्म मानने में बहुत खुशी हासिल होगी।’’

अब्दुल हमीद ने समझा कि काम बन रहा है। उसने बम्बई जाने से पहले नगीना की अम्मी सालिहा को नगीना के पास छोड़ जाने का फैसला कर लिया।

पिता ने अपनी तजवीज़ ज्ञानस्वरूप के सामने उसकी दुकान पर की थी और जब इस बात पर वह राजी हुआ कि वह जमानत उठ जाने पर बम्बई में कारोबार के लिए जा सकता है तो अब्दुल हमीद स्वयं बम्बई जाने से पहले सालिहा को अपनी लड़की के पास ज्ञानस्वरूप के मकान पर छोड़ गया।

ज्ञानस्वरूप रात को दुकान से घर गया तो अपनी छोटी अम्मी, नगीना की माँ को वहाँ ड्राइंगरूम में बैठा देख गम्भीर विचार में निमग्न हो गया। इस पर भी उसने अम्मी के सामने अपनी कोई बात नहीं की।

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