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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


सोफी की योजना के अनुसार एक नवीन बस्ती बनाई गई। सोफी ने अमेरिका में पत्र लिखा था इससे वहाँ से धर्म-प्रचार के लिए बीस हज़ार डालर की प्रथम किश्त आ गई। इस धन से, नदी के दूसरी ओर एक नई बस्ती का निर्माण होने लगा। इस बस्ती में जहाँ मदर मरियम की मूर्ति के साथ गिरजाघर बनने लगा वहाँ नाग-देवताओं का मन्दिर भी बन गया।

सोफी को अपने पति को छोड़कर आए एक वर्ष से अधिक हो गया था। उसको इन वनवासियों को सभ्य बनाने और उनके मन में ईसाई धर्म की प्रेरणा करने का काम इतना रुचिकर प्रतीत हुआ था कि अपने पति की सुधि कभी आई ही नहीं।

नई बस्ती का, जिसका नाम सोफीगंज रखा गया था, निर्माण-कार्य वेग से हो रहा था कि एक दिन जनरल माइकल वहाँ आ धमका।

सोफी ने अपने लिए अपने ही पैसे से एक बंगला बनवा लिया था और उसमें वह सोना और धनिक के साथ रहती थी।

अपने पति को आया देख सोफी परेशानी अनुभव करने लगी। इस पूर्ण अवधि में उसने स्वयं को वनवासियों के कार्य में इतना लीन कर लिया था कि उसको पति के विषय में विचार करने का अवसर ही नहीं मिला। वास्तव में वह अपने और अपने पति के विषय में विचार करने से बचने के लिए ही यह सब यत्न कर रही थी। अब वह आया तो उसको इस विषय में विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।

वार्डन ने जनरल साहब की आवभगत की। साथ ही उसने सोफी के पास भी सूचना भेज दी और जनरल को सोफी के बंगले पर ले गया। वह नई बस्ती के निर्माण के लिए गई हुई थी और सोना भी उसके साथ ही थी। परन्तु धनिक बंगले के बरामदे में बैठा था।

वार्डन ने धनिक से कहा, ‘‘चौधरी जनरल साहब आए हैं।’’

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