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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


‘‘सत्य! लेकिन क्यों आए हैं?’’

‘‘सोफी को ले जाने के लिए।’’

धनिक गम्भीर विचार में लीन हो गया। वार्डन ने पूछा, ‘‘उनसे मिलोगे?’’

बिना विचार किए ही उसने अपने मन की ग्लानि के कारण कह दिया, ‘‘नहीं, कोई आवश्यकता नहीं है।’’

वार्डन को विस्मय तो हुआ, परन्तु बोला कुछ नहीं। सोफी आई तो माइकल के सामने जाकर खड़ी हो गई।

‘‘ओह! तुम आ गई हो?’’

‘‘गुडमार्निंग।’’ यह औपचारिक स्वागत कर वह उसके सम्मुख बैठ गई। फिर कुछ विचार कर बोली, ‘‘आप क्या किसी सरकारी काम से आए हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी इस विभाग से बदली हो गई है। मैं अब कराची जा रहा हूँ। इस कारण मैं अपनी पत्नी को साथ लेने के लिए आया हूँ।’’

‘‘आपके आने से पूर्व मैंने आपको एक पत्र लिखा था। क्या वह आपको मिला नहीं?’’

‘‘मिला था।’’ माइकल ने जेब से उस पत्र को निकालकर सामने मेज़ पर रख दिया। ‘‘यही है न! मैं इसी के विषय में बात करने के लिए आया हूँ।’’

‘‘हाँ कहिए, क्या चाहते हैं आप?’’

‘‘मैं चाहता हूँ कि तुम इस चिट्ठी को उठाकर फाड़ डालो।’’

‘‘फाड़ने के लिए तो मैंने लिखी नहीं थी।’’

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