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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


‘‘पर सरकार! मैं तो जानता ही नहीं। हाँ अगर मेमसाहब चलें तो वह बहुत अच्छा स्केटिंग जानती हैं। साहब भी कभी पीछे रह जाते हैं।’’

‘‘फिर भी चलना। मैं अवश्य गिर पड़ूँगा। इस कारण तुम मुझे उठने और चलने में सहायता तो दे ही सकते हो।’’

चौकीदार समझ रहा था कि कोई धनी आदमी है। सैकड़ों रुपये व्यय कर केवल स्केटिंग का शौक पूरा करने के लिए आया है। बहुत बड़े इनाम के लोभ में ताले तोड़ने की बात छोड़कर साथ चलने पर विचार करने लगा।

उसे चुप देख बड़ौज ने कह दिया, ‘‘यह कुली खाना बना रहा है। तुम इसकी सहायता कर दो और इसको समझाकर चलने के लिए तैयार हो जाओ।’’

‘‘अरे मोहनू!’’ उसने कुली की ओर देखकर कहा, ‘‘खाना बनाकर सब सामनेवाले बंगले पर चले आना। स्केटिंग करने के बाद हम भोजन वहीं पर करेंगे।’’

बंगले में साहब से बहुत हेलमेल की बात सुन खानसामे के सब संशय दूर हो गए और वह स्केटिंग-ग्राउण्ड में चलने के लिए तैयार होने लगा।

बड़ौज के विस्मय का ठिकाना नहीं रहा जब बिन्दू को भी स्केटिंग के लिए जाने को तैयार देखा। बड़ौज ने पूछ लिया, ‘‘तो आप भी चल रही हैं?’’

पति-पत्नी दोनों हँस पड़े। डाकबंगले के खानसामे ने बिन्दू को स्केट्स बाँधे, और उसके हाथ में एक लम्बी-सी छड़ी पकड़ा दी। छड़ी के नीचे लोहे की तीखी नोक लगी थी, जिससे स्केटिंग करने वाला अपना संतुलन ठीक रख सकता है।

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