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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...

5

दिन-भर बिन्दू प्रसन्न रही। बड़ौज ने बिन्दू के बच्चे भी देखे। सत्य ही, वे उसको बहुत ही प्यारे लगे। बिन्दू स्वयं हैरान थी कि उसके मन में जो उल्लास पैदा हुआ है वह पहले कभी अनुभव नहीं हुआ था। वे लोग भोजन के बाद विश्राम के लिए रिटायर हुए, तो बड़ौज डाकबंगले पर चला गया। उसको सायंकाल की चाय के लिए स्टीवनसन के घर पर निमंत्रण था।

जब स्टीवनसन और बिन्दू सोने के कमरे में पहुँचे तो स्टीवनसन ने बिन्दू से पूछा, ‘‘डार्लिंग बहुत खुश मालूम होती हो आज?’’

‘‘हाँ, कदाचित् यह आज के खुले मौसम के कारण है।’’

‘‘खुले दिन तो यहाँ पहले भी आते रहे हैं। जब यह आदमी सैली का मुख चूम रहा था तब तुम्हारी आँखों में विशेष चमक उत्पन्न हो गई थी।’’

बिन्दू ने अपने पति के गम्भीर मुख को देखा तो वह भी गम्भीर हो गई। उसने कह दिया, ‘‘मुझे तो ऐसी कोई बात अनुभव नहीं हुई। हाँ, इतनी बात अवश्य है कि जब कोई आदमी मेरे बच्चों की प्रशंसा करता है तो मुझको प्रसन्नता होती है। इसके लिए मैं विवश हूँ। यह तो माँ के लिए स्वाभाविक बात है।’’

‘‘परन्तु बिन्दू, वह सैली का मुख चूम रहा था और तुम्हारे हाथ तुम्हारे गालों पर क्यों चले गए थे?’’

‘‘मुझे तो इसका कोई स्मरण नहीं।’’

‘‘मुझको स्मरण है।’’

‘‘आपको तो व्यर्थ में मेरी निष्ठा पर संदेह होता रहता है।’’

‘‘तो फिर तुम मेरे साथ विवाह क्यों नहीं कर लेतीं?’’

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