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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


नलिनी से पूछने पर तो उसने कह दिया, ‘‘सुमति भाभी! आप लोगों पर मेरा पहले ही बहुत बड़ा बोझ है। मैं एक रत्ती-भर का अधिक बोझ आप पर डालते हुए लज्जा अनुभव करती हूँ।’’

‘‘बोझ तो है नहीं। न तुम्हारा और न ही इस बच्चे का। रही संस्कार की बात। उस पर एक के स्थान दो के नामकरण में भला क्या कठिनाई होगी? मैंने इस कारण पूछा है कि यदि तुम लोग किसी प्रकार की विशेष रीति-रिवाज का पालन करना चाहते हो तो बता दो?’’

नामकरण उत्सव पर दो बच्चों का नामकरण संस्कार हुआ। सुदर्शन के कॉलेज के अधिकारी और सहयोगी भी आमन्त्रित थे। सब आए। कश्मीरीलाल और उसकी पत्नी की ओर के लोग भी आए और सबके सम्मुख ही दोनों बच्चों के संस्कार किए गए। श्रीपति, कात्यायिनी तथा उनके तीन बच्चे भी आए थे।

हरिद्वार से नलिनी की माँ भी आ पहुँची। इस प्रकार के समारोह से सुदर्शन के प्रति रहा-सहा सन्देह भी मिट गया।

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