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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


बिना बोले ही निष्ठा ने जब माँ की ओर प्रश्न-भरी दृष्टि से देखा तो माँ ने भी बिना किसी प्रकार का नमक-मिर्च लगाए पूर्ण वार्तालाप उसे सुना दिया। वह चुपचाप सुनती रही।

माँ के कह चुकने पर निष्ठा ने अपना तानपूरा उठाया और उस पर स्वर भरने लगी। माँ ने समझा कि वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने के लिए स्वयं को संगीत के साथ तन्मय कर रही है।

उसको विचार करने का अवसर देने के ख्याल से माँ वहाँ से उठकर चली गई। कुछ काल के बाद, उसको निष्ठा के कमरे से तानालाप सहित सुनाई दिया–

हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हो
साधन धाम विबुध दुरलभ तनु, मोहे कृपा कर दीन्हो।
हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हो


ज्यो-ज्यों वह गा रही थी उसके स्वरों में मधुरता और तानालाप में कुशलता आती जाती थी। कल्याणी इस भजन से लड़की के मन पर अपने वृत्तान्त की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा रही थी।

निष्ठा गा रही थी–

कृपा डोरि बनसी पद अंकुश परम प्रेम मृदु मारो।
एहि विधि वैधि हरहु मेरा दुःख कौतुक राम तिहारो।

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