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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


हरि तुम बहुत–

है श्रुति विदित उपाय सकल सुर केहि केहि दीन निहोरे।
तुलसिदास यही जीव मोह तजु, जेहि बांध्यों सोई छोरे।


हरि तुम बहुत–

कल्याणी समझीं नहीं कि रामजी ने उसकी पुत्री पर क्या की है।

सायंकाल जब सुमति आई तो निष्ठा उसको पकड़कर अपने कमरे में ले गई। वहाँ बैठाकर उसने पूछा, ‘‘भाभी! अब क्या कहती हो?’’

‘‘किस विषय में पूछ रही हो?’’

‘‘उसी विषय में, जिसमें सवेरे पूछा था।’’

‘‘सामान्य स्थिति में मेरी सम्मति वही है। इस विशेष वर के विषय में तो माताजी ही बताएँगी।’’

‘‘मेरी अनपढ़ भाभी कुछ नहीं बताएगी क्या?’’

‘‘उसकी बात किसी भी प्रकार मानने योग्य नहीं हो सकती।’’ सुमति समझ गई थी कि उसकी सास ने सब बता दिया है।

निष्ठा हँसी तो सुमति भी हँस पड़ी। निष्ठा प्रसन्न थी। सुमति इसका कारण नहीं जान सकी। उसने कहा, ‘‘प्रतीत होता है माताजी ने पूर्ण वृत्तान्त बता दिया है!’’

‘‘वृत्तान्त तो बताया है परन्तु अपनी सम्मति नहीं बताई।’’

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