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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।

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निष्ठा ने बी० ए० की परीक्षा दे दी थी। परीक्षा-फल अभी घोषित नहीं हुआ था। उसका पूर्ण समय संगीत-साधना में व्यतीत होता था। प्रातःकाल ब्राह्म-मुहूर्त में उठकर वह अभ्यास प्रारम्भ कर देती थी। घर के सभी प्राणी प्रायः उसकी संगीत-ध्वनि सुनकर उठा करते थे। वह घर में सबको जगाने का अलार्म समझी जाती थी।

उसके सितार की ध्वनि सुनकर सबसे पहले सुमति उठती थी। वह उठकर बिजली के जग में पानी रखकर चाय बना डॉ. साहब को दे उन्हें जगाती थी। तदनन्तर स्वयं चाय पीकर वह निष्ठा के कमरे जा मुग्ध-मन से उसके संगीत को सुना करती थी।

सुमति ने उसको कुछ बंगला गीत भी सिखाए थे और निष्ठा ने उनको स्वरों में बाँध लिया था। एक दिन वह एक ऐसा ही गीत गाने लगी।

एक घण्टा सितार पर अभ्यास कर निष्ठा ने सुमति को कहा, ‘‘आज मैं तुम्हारा वाला गीत गा रही हूँ, देखना कैसा बन पाया है।’’

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