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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘वह आपको कब मिली थी?’’

‘‘मैं गणित नहीं पढ़ाती। गणित के अध्यापक मेरे पति थे। इस कारण गणित की लड़कियों से मेरा सम्पर्क बहुत कम रहता था।’’

‘‘आपके पति कहाँ है?’’

‘‘वे कल से लापता हैं। फर्नीचर वाले का भाड़ा देने के लिए मैंने उनको एक ब्लैंक-चैक दिया था। भाड़ा आदि सब प्रकार का खर्च चुकाने के लिए उनको लगभग एक बजे गए थे और रात तक नहीं लौटे। मैं अभी फर्नीचर वाले से पूछने गई थी कि उसको रुपया मिल गया है अथवा नहीं। मैं बैंक में भी पता करने के लिए गई थी कल मेरे हिसाब में कुछ रुपया निकला है अथवा नहीं। वहाँ से मुझे पता चला है कि कल ढाई हजार रुपया मेरे हिसाब में से निकाला गया है।’’

‘‘तो आपको विदित नहीं कि वे कहाँ हैं?’’

‘‘नहीं, इतना ही नहीं, वे तो मेरा रुपया भी चुराकर ले गए हैं।’’

नलिनी के बयान लिखकर उस पर उसके हस्ताक्षर करवा लिए गए और पुलिस वहाँ से चली गई।

नलिनी ने दिल्ली में अपने हिसाब में से एक हज़ार रुपया मँगवाया और उस रुपए के आने की प्रतीक्षा करने लगी। वह दो बातें समझ गई कि एक तो वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती, दूसरे यह कि अब नागपुर में स्कूल नहीं चलेगा। इस कारण उसने अब वह मकान भी छोड़ने का निश्चय कर लिया।

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