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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


फकीरचन्द अनुभव कर रहा था कि वह किसी झंझट में फँस रहा है। इसपर भी उसने सोचा कि जब वह कह चुका है कि वह देखभाल तो रखेगा ही, चाहे कुछ भी हो। इस कारण उसने मोतीराम से कहा, ‘‘मोतीराम ! कल नन्दू, कामता, लखू और महतू को लेकर प्रातः पाँच बजे जंगल में पहुँच जाना।’’

‘‘हाँ, काम कल से आरम्भ करा दो। फकीर ! मैं तुम्हारे इस अनुग्रह को जीवन-भर स्मरण रखूँगा।’’

उसी रात को जब फकीर सोने के लिए नीचे सेहन में अपनी खाट पर पहुँचा, तो उसकी माँ उसके पास आकर बैठ गई। सेठ इत्यादि तो सोने के लिए छत पर चले गये थे। रामरखी ने कहा, ‘‘सो गये हो बेटा !’’

‘‘अभी नहीं माँ ! क्या बात है?’’

‘‘एक बात तुमसे कहना चाहती हूँ। एक दिन पहले भी कहने का यत्न किया था, परन्तु पूरी बात हो नहीं सकी थी। मैंने कहा था न कि तुम अब विवाह कर लो।’’

‘‘हाँ माँ ! मुझको स्मरण है। साथ ही मैंने भी कुछ कहा था।’’

‘‘वह मुझको याद है। इसलिए कहना चाहती हूँ कि जब से पन्नादेवी यहाँ आई है अपनी लड़की ललिता के लिए कह रही है। मैं उसको टालमटोल करती रही हूँ। आज उसने कहा है कि सेठजी मान गये हैं और हमको भी मान जाना चाहिए।’’

इतना कहकर फकीरचन्द की माँ अपने पुत्र का मुख देखने लगी। फकीरचन्द का कहना था, ‘‘माँ ! तुमने क्या विचार किया है?’’

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