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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘इस कारण कि मैं आपका पड़ोसी होने के नाते, अपने घर पर बैठे-बैठे यह काम कर दूँगा। कुछ लूँगा नहीं।’’
सेठ ने, यह सुन कि फकीरचन्द उसकी नौकरी करना नही चाहता, उसकी सेवाएँ बिना वेतन के भी लेने का निर्णय कर लिया। इसपर भी वह, मन में वेतन से अधिक सुदृढ़ सम्बन्ध बना, उससे ईमानदारी से काम लेने की योजना बनाने लगा। उसने अपने मन में उसको अपना दामाद बनाने का निश्चय कर लिया। परन्तु अभी इस विषय में बात नहीं की। उसने केवल यह कहा, ‘‘देखो फकीरचन्द ! मैं समझता हूँ कि तुम्हारे जैसा आदमी, इन दोनों खेतों का काम कर लेगा। मैं तुमको इस काम के लिए पाँच सौ रुपया महीना देकर बहुत ही प्रसन्न होता। इसको लेने में यदि तुम संकोच अनुभव करते हो, तो भी मैं काम तो तुमसे लूँगा ही। रहा उस काम के प्रतिकार में मुझको तुम्हें क्या देना चाहिए, यह प्रश्न अभी खुला रखना चाहता हूँ। भविष्य में इसपर विचार कर लेंगे।’’
फकीरचन्द इसका अर्थ न समझ चुप रहा। सेठ ने उसको चुप देखकर एक हजार रुपये के नोट उसके पास रख दिये और कहा, ‘‘मैं सायंकाल उस आदमी को तुम्हारे पास ले आऊँगा, जिसको तुम्हारे कहे अनुसार काम करना होगा।’’
सायंकाल फकीरचन्द काम से लौटा तो सेठ मोतीराम को लिए हुए उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। फकीरचन्द को जब बताया गया कि मोतीराम उसके अधीन काम करेगा, तो उसने काम करने से इन्कार कर दिया। सेठ ने कारण पूछा। फकीरचन्द ने मोतीराम का पूर्व वृत्तान्त बता दिया। उस वृत्तान्त को सुन सेठ ने कहा, ‘‘यह सब तो मैं पहले से ही जानता था। बात यह है कि उस घटना के उपरान्त जिसमें यह तुम्हारी भूमि लेने का प्रयत्न कर रहा था, इसको बहुत पश्चात्ताप करना पड़ा है। राजा साहब ऊँट ने भी इसकी सिफारिश की है और उनका कहना है कि मानवता के नाते हमको प्रत्येक मनुष्य को उन्नति करने का अवसर देना चाहिए। यह अपने पिछले कर्मों पर पश्चात्ताप करता है। मैंने इसको कह दिया है कि यदि वह तुम्हारे कहे अनुसार काम नहीं करेगा, तो तुम इसको काम से निकाल भी सकते हो, साथ ही यदि अब इसने बेईमानी की, तो पाँच वर्ष से कम दण्ड नहीं होगा।’’
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