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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मैंने तो यह निर्णय किया है कि आपका यह काम कर नहीं सकूँगा। मेरे अपने खेतों पर इतना काम होगा कि मैं उसके अतिरिक्त कुछ भी समय नहीं निकाल सकूँगा।’’
‘‘इसपर भी मैं समझता कि यदि तुम मेरी योजना समझ लो तो काम कर सकोगे। मैंने एक आदमी ऐसा ढूँढ़ा है, जो सब काम करेगा। तुम उसको पहली सायंकाल काम बता दिया करोगे। ऐसे ही, जैसे तुम अपने खेतों का काम अपने कर्मचारियों को बता दिया करते हो। वह आदमी अगले दिन सायंकाल किये हुए काम का ब्यौरा बता दिया करेगा। सब आय तुम्हारे हाथ में रहेगी और खर्चा भी तुम्हीं करोगे। कभी-कभी सप्ताह में एक-आध बार, आवश्यकता पड़ने पर खेतों में जाकर देख आया करना। बस इतने मात्र के लिए तुम प्रबन्धक हो। वह तुम्हारा सहायक प्रबन्धकर्त्ता रहेगा। इसके लिए भी तुमको मैं पाँच सौ रुपया दूँगा।’’
‘‘और उस सहायक को क्या दे रहे हैं?’’
‘‘एक सौ रुपया महीना।’’
‘‘मैं विचार करता हूँ कि मैं नहीं कर सकूँगा।’’
‘‘नहीं, तुम कर सकोगे। देखो, तुम कुछ काल के लिए काम करके देखो। मुझको विश्वास है कि तुम दोनों काम कर सकोगे।’’
‘‘पर एक बात और है। मैं, यदि यह काम करूँगा, तो बिना बेतन के करूँगा।’’
‘‘क्यों?’’
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