लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


वास्तविक बात यह थी कि सेठानी ने फकीरचन्द की माँ से जब ललिता की सगाई की बात पक्की कर ली तो उसने और उसके पति ने मन में विचार कर लिया कि अब ललिता की सास के घर का नहीं खाएँगे। इस कारण रात ही उन्होंने दलिया, चीनी और घी गाँव से मोल लेकर ललिता को दे दिया था कहा था कि खाना पृथक् बनाये।

ललिता को इस व्यवहार से विस्मय हुआ था और उसने कहा भी, ‘‘माताजी से कहे बिना कैसे बनाऊँगी?’’

‘‘तुम बनाओं। यदि वे कुछ कहें तो कहना कि मुझसे पूछ लें।’’

जब ललिता पृथक, चूल्हे पर आग जलाने लगी तो रामरखी ने पूछा, ‘‘ललिता ! क्या हो रहा है?’’

‘‘दलिया बना रही हूँ माताजी !’’

‘‘किसके लिए?’’

‘‘हम सबके लिए।’’

‘‘यह दलिया आया कहाँ से? यहाँ तो तैयार नहीं था।’’

‘‘माँजी को पता है।’’

‘‘लाओ, मैं बना दूँ।’’

‘‘नहीं, उनकी आज्ञा है कि पृथक् बनाऊँ।’’

फकीरचन्द की माँ कुछ-कुछ तो समझ गई। इसपर भी वह इस प्रकार नहीं चाहती थी। उसने केव यह कहा, ‘‘अच्छी बात है। वे स्नान कर आएँगी तो पूछ लूँगा।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book