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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
ललिता समझी कि सेठजी और फकीरचन्द में किसी बात का झगड़ा हो रहा है और खाना-पीना पृथक् हो गया है। इसपर भी वह विस्मय कर रही थी। उसकी विचार था कि यदि झगड़ा हुआ है तो यहाँ से चला जाना ठीक है, न कि इनके घर में रहते हुए, इनके ही चौके में पृथक् चूल्हा जलाना।
फकीरचन्द चला गया तो पन्नादेवी चौके में देखने आई कि दलिया बनने में कितना विलम्ब है। वह आई तो रामरखी ने कह दिया, ‘‘बहिन जी ! यह पृथक् चूल्हा-चौका तो शोभा नहीं देता।’’
ललिता के कान खड़े हो गये। वह भूमि की ओर देख रही थी। उसकी माँ ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘लड़की के घर का खाते हुए लज्जा लगती है न !’’
इसपर रामरखी ने उत्तर दिया, ‘‘तो मूल्य दे देते।’’
‘‘इसके पिता कहते थे कि शाक-भाजी अन्नादि का मूल्य तो दे सकते हैं, परन्तु समधिन के परिश्रम का मूल्यांकन सम्भव नहीं होगा।’’
‘‘कुछ अधिक ही दे देते। इससे टोटा पड़ने वाला था क्या?’’
‘‘तो उनसे पूछ लूँगी। साथ ही मैंने समझा कि लड़की को अब काम का अभ्यास भी डालना चाहिए।’’
इस वार्त्तालाप का प्रभाव ललिता पर हुए बिना नही रहा। वह स्वयं को इस घर का प्राणी समझने लगी, जहाँ उसका जीवन व्यतीत होने वाला था। साथ ही वह यह अनुभव करने लगी थी कि उसका एक-एक काम अब उसके होने वाले पति की दृष्टि में आने लगेगा, इससे उसको संकोच भी होने लगा।
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