|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
पन्नादेवी तो पूजा करने अपने कमरे में चली गई। रामरखी बिहारीलाल के लिए खाना परस रही थी। बिहारीलाल आया और पीढ़े पर बैठ बोला, ‘‘माँ !’’ परन्तु कहता-कहता रुक गया। उसका ध्यान ललिता की ओर चला गया था। उसको भी ललिता को पृथक् चूल्हे पर खाना बनाते देख विस्मय हुआ। उसने पूछ लिया, ‘‘यह क्या हो रहा है ललिता?’’
‘‘देखो बिहारीलाल !’’ उसकी माँ ने कहा, ‘‘अब वह तुम्हारी भाभी बनने वाली है। इसलिए आदर से बात किया करो।’’
वास्तव में घर में केवल बिहारीलाल ही था जो ललिता से खुलकर बात किया करता था। दोनों बड़ी औरतें तो उसपर नियन्त्रण रखने के लिए केवल आज्ञा ही दिया करती थीं। रामचन्द्र को अपने मनोरंजन से अवकाश नहीं था और फकीरचन्द काम-काज में व्यस्त रहता था। बिहारीलाल को पर्याप्त अवकाश रहता था और वे खुलकर बातचीत करने लगे थे। सायंकाल जब वह स्कूल से लौटता तो घर के पिछवाड़े वाली पुष्पवाटिका मे वे प्रायः मिल जाते और बातचीत होती रहती थी।
ललिता घर पर ही पढ़ती रही थी। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी भी कुछ-कुछ पढ़ने और बोलने लगी थी। बिहारीलाल उसकी अपनी पुस्तकें पढ़ने के लिए दिया करता था।
बिहारीलाल ने ललिता को कभी भी अपनी भाभी के रूप में नहीं देखा था। वह उसको एक अभ्यागत लड़की के रूप में ही जानता था और समझता था कि वह और उसकी माँ एक दिन वहाँ से चले जाएँगे और फिर एक रेल के यात्री की भाँति आँखों से ओझल हो जाएँगे। अब यह जान कि वह उनके घर का एक अभिन्न अँग बनने वाली है, उसको विस्मय हुआ। कुछ विचारकर वह हँस पड़ा।
माँ ने पूछा, ‘‘क्यों बिहारी ! क्या बात है?’’
|
|||||

i 









