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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘माँ ! तुमने बहुत अच्छा किया है, जो भैया से इसको नत्थी कर रही हो। कहीं मेरे लिए कहती, तो मैं अस्वीकार कर देता।’’
ललिता ने बिहारीलाल को देख दाँत चिढ़ा दिये। माँ का ध्यान खाना परसने की ओर था, इस कारण उसने नहीं देखा। बिहारीलाल ने देख लिया था। इस कारण वह और भी जोर से हँसने लगा।
माँ ने पूछा, ‘‘इसमें हँसी की क्या बात है? तुमसे इसका विवाह नहीं कर रही तो केवल इसलिए कि तुम इसके योग्य नहीं हो। पहिले इतनी योग्यता प्राप्त करो, फिर विवाह की बात करना।’’
‘‘क्या अयोग्यता है मुझमें?’’
‘‘तुममें अभी तक मानव को पहचानने की योग्यता नहीं आई। तुमने इसका साफ गन्दगी रंग देखा है, इसी से इसको कुरूप समझने लगे हो। तुम इसके मन और आत्मा को नहीं देख सके।’’
‘‘माँ ! यह गन्दगी नहीं है। यह तो काली है।’’
‘‘आँखों को ऐनक लगवाओं बिहारी !’’
बिहारीलाल हँस पड़ा और हाथ में गिलास पकड़ बोला, ‘‘अच्छा माँ ! तुम कहती हो मानता हूँ कि ललिता भाभी पार्वती समान गोरी है। अब तो ठीक है न?’’
‘‘हाँ; और सीता समान पवित्र। समझे।’’
‘‘और माँ ! मैं लक्ष्मण समान देवर।’’
तीनों हँसने लगे।
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