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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘तो जानते क्यों नहीं? सगाई के उपरान्त जानने से क्या लाभ होगा?’’

‘‘अच्छी बात है। आज रात को पूछूँगा।’’

‘‘और मुझे कब बताओगे?’’

‘‘तुमको क्यों बताऊँगा? माँ को बता दूँगा। तुम उनसे पूछ लेना।’’

‘‘नहीं, मुझे बताना।’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘मुझको बहिन जो कहते हो।’’

इतने में पानी भरा गगरा कुएँ से खींच लिया गया और ललिता उसको खोल, उठाकर चल दी। बिहारीलाल मुख देखता रह गया। बहिन और भाई के शब्दों में माधुर्य अवर्णनीय है। इसका प्रतिकार करना अति कठिन है। अतः बिहारीलाल उसी सायकांल भैया से इस विषय पर बात चलाने का निश्चय कर लिया।

फकीरचन्द सायंकाल का हिसाब-किताब कर चुका था। इस समय करोड़ीमल झाँसी से आया और सीधा फकीरचन्द के कमरे में आ खड़ा हुआ। फकीरचन्द ने उसको अपने समीप बिठाया, तो वह कहने लगा, ‘‘देखो बेटा फकीरचन्द ! आज मेरा यहाँ का काम समाप्त हुआ। मेरे पीछे अब तुम जंगल का काम कराना। मैं परसों चला जाऊँगा।’’

‘‘अभी तक तो मोतीराम काम ठीक कर रहा है। फिर भी इससे मन डरता है।’’

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