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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैंने इसके बाप से कहा है कि वह इसका विवाह कर दे। विवाह हो जाने पर यह ठीक हो जाएगा।’’

इतना कह सेठ उठकर अपने कमरे में चला गया। बिहारीलाल उसी कमरे के एक कोने में बैठा, अपनी स्कूल की पुस्तकें देख रहा था। सेठ के चले जाने पर उसने फकीरचन्द की ओर देखकर पूछ लिया, ‘‘भैया !’’

‘‘हाँ, बिहारी !’’

‘‘तुम्हारा विवाह होनेवाला है क्या?’’

‘‘किसने कहा है तुमको?’’

‘‘ललिता ने।’’

‘‘क्या कहा है?’’

‘‘यही, सेठजी के जाने की बात हो रही थी। मैंने कहा था, ‘ललिता ! अब तो खेतों का प्रबन्ध हो गया है। तुम लोग कब जा रहे हो?’’ उसने कहा, ‘अभी एक काम और रहता है।’ मेरे पूछने पर उसने बताया कि मेरे भैया की-सगाई होनेवाली है और हमारी माताजी ने सेठजी को उस अवसर पर यहीं ठहरने का निमन्त्रण दिया है।’’

‘‘तो तुमको उसके कहने पर विश्वास नहीं आया?’’

‘‘भैया ! वह बहुत झूठी है। मुझको कहती थी कि बम्बई में बहुत ऊँचे-ऊँचे मकान हैं इतने ऊँचे कि लोग मकानों की छतों पर चढ़कर आकाश के ऊपर चले जाते हैं और वहाँ स्वर्ग की सैर कर फिर मकान की छतों पर आकर बम्बई में आ जाते हैं।’’

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