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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इस आयोजन के उपरान्त राजमाता और रानी साहिबा लड़की को आशीर्वाद देने आईं। ललिता, पन्नादेवी और रामरखी एक बड़े कमरे में उनका स्वागत करने के लिए बैठी थी। वे दोनों आईं, तो उनके सम्मानार्थ वे उठ खड़ी हुईं। तदनन्तर उनको जल-पान कराया गया। राजमाता ने ललिता को आशीर्वादसूचक चौदह छुहारे और नारियल दिया। इससे तो फकीरचन्द की माँ की आँखों में आँसू छलक आये। उसने पुनः अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।

राजमाता ने केवल यह कहा, ‘‘हमने फकीरचन्द के हाथ कहला भेजा था कि आप जब झाँसी आएँ तो दर्शन दें। इस कारण जब यह अवसर आया तो हम स्वयं ही चली आई हैं।

‘‘भूमि देते समय न तो राजा साहब को और न ही हमारे मैनेजर को यह विश्वास होता था कि यह लड़का इस कठिन काम में सफल हो सकेगा। तदुपरान्त आप लोग यहाँ आये और काम आरम्भ हो गया। इसपर भी हमारा सन्देह बना ही रहा। हम समझते थे कि जंगल कटवा कर लकड़ी सस्ते भाव पर बेचकर रुपया एकत्रित कर लेना तो हो गया, परन्तु खेची-बाड़ी यहाँ हो सकेगी, यह कहना कठिन था। इस वर्ष जब वह हमको बिना माँगे और समय से बहुत पहले ही लगान देने आया, तो हम आश्चर्य करते रह गये। साथ ही यह जानकर कि फकीरचन्द का पालन-करते रह गये। साथ ही यह जानकर कि फकीरचन्द का पालन-पोषण उसकी माँ ने ही किया है, तो उसकी माँ के दर्शन करने की लालसा जाग पड़ी। आज आपके दर्शन कर हम कृतकृत्य हो गये।’’

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