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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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राजमाता के मन के भावों का रामरखी पर बहुत ही प्रभाव हुआ था। जब यह बात हो रही थी, ललिता समीप ही बैठी थी। उसके मन में भी उथल-पुथल मचनी आरम्भ हो गई। राजमाता ने उसकी सास को पूजा-योग्य देवी कहा था। इससे उसके मन में अपनी सास और फिर उसके लड़के के लिए बहुत ही अच्छे विचार उत्पन्न हुए। वह विचार कर रही थी कि जिस स्त्री ने अपने पुत्र को इतना योग्य बना दिया है कि बड़े-बड़े आदमी जिसकी प्रशंसा करते हैं, वह उसके साथ भी तो अच्छा ही व्यवहार करेगी। ऐसी सास के पुत्र के लिए उसके मन में अनुराग उत्पन्न होने लगा।
जब राजा साहब इत्यादि चले गये तो फकीरचन्द की माँ ने गाँव की औरतों को मिठाई देकर विदा किया। फकीरचन्द और बिहारीलाल ने गाँव के छोटे-बड़े लोगों को सत्कार सहित विदा किया।
जब सब लोग बधाई देकर विदा दो गये तो बिहारीलाल को अपनी माँ की हँसी में कही बात स्मरण हो आई। वह वहाँ जा पहुँचा, जहाँ माँ ललिता को लिए बैठी थी। पन्नादेवी भी उसके पास बैठी आगे के कार्यकम पर विचार कर रही थी। बिहारीलाल आया तो माँ ने पूछा, ‘‘हाँ, बिहारी ! किस काम से आये हो?’’
‘‘माँ ! तुमने कहा था न कि सगाई के पश्चात् भाभी के चरण स्पर्श करना।’’
रामरखी ने हँसते-हुए कहा, ‘‘हाँ, कहा तो था। भला क्षमा माँग कर देखो तो, मिलती है वात्सल्यता अथवा नहीं।’’
‘‘माँ ! क्षमा माँगने नहीं आया। मैं तो दूसरी माँ बनाने आया हूँ।’’
इतना कह वह घुटने टेक ललिता के चरण स्पर्श कर कहने लगा, ‘‘भाभी ! आशीर्वाद दो।’’
ललिता ने पाँव समेट लिये; परन्तु पन्नादेवी ने पूछ लिया, ‘‘क्या आशीर्वाद चाहते हो?’’
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