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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘जो भाभी प्रसन्न होकर दें।’’

रामरखी ने कह दिया, ‘‘ललिता बेटी ! इसको आशीर्वाद दो कि इस वर्ष मैट्रिक की परीक्षा पास कर ले और फिर समय पर तुम्हारे जैसी सुशील देवरानी लाकर घर की शोभा बढ़ावे।’’

ललिता मन में विचार कर रही थी कि कह दे कि भगवान करे उसको भी उस जैसी काली और मोटी नाक वाली बहू मिले, परन्तु माँ और सास के समीप होने के कारण कुछ नहीं कह सकी।

इसपर माँ ने कह दिया, ‘‘बिहारी ! अब जाओ। आशीर्वाद मिल गया। देखो, सेठजी को कहो कि माँजी बुला रही हैं।’’

बिहारी गया तो दोनों औरतें हँस पड़ी। सेठानी ने कहा, ‘‘बहुत हँसमुख लड़का है।’’

जब सेठ भीतर आया तो ललिता की माँ ने कहा, ‘‘ललिता की सास कह रही हैं कि विवाह की तारीख आज ही निश्चित हो जानी चाहिए।’’

‘‘यह बम्बई चलकर निर्णय करेंगे।’’

‘‘किससे निर्णय करना है? निर्णय करनेवाले तो आप और लड़के की माँ हैं।’’

‘‘विचारणीय बात तो यह है कि क्या ये बारात लेकर बम्बई आवेंगी?’’ सेठ ने कहा।

‘‘आ तो सकती हूँ। इसपर भी यह स्पष्ट है कि हम अपनी आर्थिक स्थिति के अनुकूल ही तो बारात ला सकेंगे। वह आपको अपने मान के अनुरूप प्रतीत होगी अथवा नहीं, यह आपके विचार करने की बात है। ऐसी अवस्था में मेरी सम्मति है कि विवाह चुपचाप हो जाय। जिस दिन आप कहेंगे, मैं, फकीरचन्द तथा उसके भाई के साथ वहाँ आ जाऊँगी। जो कुछ विवाह की प्रसन्नता में आप अपने मित्रों तथा भाई-बाँधवों में लेना-देना चाहते हैं, वह एक दिन पीछे ले-दे लीजियेगा। हमको जो कुछ करना होगा, हम यहाँ आकर कर लेंगे।’’

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