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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘ठीक है, आपको बम्बई जाकर लिखूँगा।’’

‘‘आपके पहले समधी बहुत धनी सुने जाते है।’’ रामरखी ने कह दिया, ‘‘हमको बताया गया है कि वे पाँच हजार बरातियों को साथ लेकर आये थे और आपका, बारात को खाने-पिलाने में तीस हजार खर्च हो गया था। हम यह नहीं कर सकेंगे। हमारी सामर्थ्य तो दस-बीस हजार बराती लेकर आने की है। यह आपकी स्थिति के अनुकूल प्रतीत नहीं होगा। अतः विवाह तो केवल घर के आदमियों में ही होना चाहिए। शेष आप जानें, आपका काम जाने।’’

‘‘देखो समधिन ! मैं सब-कुछ समझता हूँ। यदि कुछ अधिक करने की आवश्यकता समझी गई तो आपको उसका खर्चा दें देंगे।’’

‘‘फकीरचन्द ऐसा नहीं मानेगा। उसका कहना है कि ससुराल से रुपया लेकर शान दिखाना उचित नहीं। आपके पास धन है, आप खर्च करें। हमारे पास उतना नहीं है, तो हम कम खर्च करेंगे।’’

‘‘ठीक है। आपकी इच्छा और रुचि के अनुसार ही काम होगा।’’

इस प्रकार सेठ ने लड़की की सगाई की और अपने जंगल की कटाई का प्रबन्ध कर लिया। सगाई के दिन ही सायंकाल की गाड़ी से वे बम्बई के लिए चल पड़े। मार्ग में पन्नादेवी ने सेठ से कहा, ‘‘आप भी खूब हैं। जिन्होंने आपसे किसी प्रकार भी कुछ नहीं माँगा, उनको आपने कुछ भी नहीं दिया।’’

‘‘सगाई पर देने की बात कह रही हो? मैंने यही उचित समझा है। यह मेरा सिद्धान्त है कि जब कोई काम एक रुपये में निकल सकता है, तो मैं उस पर एक आना भी अधिक खर्च करना उचित नहीं समझता। यह तो तुम जानती हो कि जब थर्ड क्लास में चढ़कर भी मैं बम्बई जाता हूँ, तो मैं फर्स्ट क्लास अथवा सैकेण्ड क्लास में सवार होकर रुपया व्यर्थ गँवाना ठीक नहीं समझता।’’

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