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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तो इसका अर्थ हुआ कि कुछ भी नहीं। मैं यह पसन्द नहीं करती। मैं समझती हूँ कि जो कुछ आपने शकुन्तला को तथा उसकी सास-श्वसुर को और उसके पति को दिया है, वह सबकुछ आप ललिता को दें। यदि इसके ससुराल वाले, सबकुछ, जो इसको तथा इसके ससुराल वालों को मिल रहा है इसके पास ही रहने देते हैं, तो इसके भाग्य की बात है।’’
सेठ पन्नादेवी से, जो उसकी दूसरी पत्नी थी, अधिक बहस नहीं कर सकता था। इस कारण उसकी बात मानने में ही भलाई समझ उसने कह दिया, ‘‘अच्छी बात है। जैसा तुम कहोगी, वैसा ही कर दूँगा।’’
इस वार्तालाप को ललिता ने सुना तो वह अपने पिता के विषय में हीन विचार बना बैठी। उसकी समझ में आया कि पिता जी शकुन्तला से अधिक प्रेम करते हैं और उसको कम मानते हैं। साथ ही वह अपने पति को, यह कहने पर कि उसको कुछ नहीं चाहिए, देवता मानते लगी थी। जहाँ अच्छे आदमियों से अपना वास्ता पड़ने से वह अपने भाग्य की सराहना करती थी, वहाँ अपने पिता के व्यवहार को देख खिन्न थी।
बम्बई पहुँचने पर सेठजी के सम्बन्धी उनसे मिलने आये और जब उनको यह पता चला कि सेठ अपनी लड़की की सगाई एक ऐसे लड़के से कर आया है, जो न तो उनकी बिरादरी का है और न ही कुछ अधिक धनी है, तो सब सेठ से रुष्ट हो गये। रुष्ट होने वालों में सबसे अधिक कुद्ध उसका छोटा भाई नेमचन्द था। नेमचन्द बम्बई में एक व्यापारी की दुकान पर मुनीमी करता था और साथ ही कभी-कभी रुई और ऊन का सट्टा भी करता रहता था। मुनीमी से उसको केवल एक सौ रुपया मासिक मिलता था, परन्तु सट्टे से उसको हजारों रुपये की आय हो जाती थी। नेमचन्द आया और यह जानकर कि ललिता की सगाई एक पंजाबी से कर दी गई है, पूछने लगा, ‘‘कोई बड़ी आसानी है भैया?’’
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