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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘कुछ बहुत अमीर तो वे हैं नहीं। हाँ, लड़का समझदार है और परिश्रमी है। जीवन-निर्वाह भली-भाँति हो जायेगा।’’
‘‘भैया ! जीवन-निर्वाह तो कुलियों का भी हो सकता है। हमें तो यह देखना चाहिए कि वह हमारे बराबर का आदमी है अथवा नहीं।’’
‘‘देखो नेमचन्द ! यह माया तो आनी-जानी है। जब मैं बम्बई में आया था, तो मेरे पास ही क्या था?’’
‘‘पर भैया ! तुम्हारी शादी तो तब ही हुई थी, जब तुम्हारे पास दो-चार लाख जमा हो गया था।’’
‘‘यह तो यहाँ भी हो जायेगा। नहीं होगा तो मैं उसको बम्बई में ले आऊँगा और यहाँ कुछ काम करा दूँगा।’’
इससे नेमचन्द को सन्तोष नहीं हुआ। उसने पूछा, ‘‘भैया मालूम होता है कि यह नाता भाभी का ढूँढ़ा हुआ है?’’
‘‘है तो यही बात।’’
‘‘तब भैया ! तुम हमारी बात मानोगे थोड़े ही। जबसे तुम्हारा यह नवीन विवाह हुआ है तुम तो भाभी के गुलाम हो गये हो।’’
सेठ करोड़ीमल ने हँसकर बात टाल दी।
परन्तु इससे भी प्रबल विरोध शकुन्तला के ससुराल वालो की ओर से हुआ। कुन्दनलाल भगेरिया सगाई का समाचार सुनकर, नाक-भौं चढ़ाकर कहने लगा, ‘‘सेठ करोड़ीमल ! क्या व्यापार कुछ पतला हो रहा है?’’
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