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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

10

फकीरचन्द को तो ललिता से सगाई की बात स्वप्न-मात्र ही प्रतीत होती थी। यह इसलिए नहीं कि सेठ बहुत धनी आदमी था और फकीरचन्द एक मध्यम श्रेणी का किसान; प्रत्युत वह यह समझता था कि दोनों के स्वभाव मिलते नहीं है। एक पाई-पाई के लिए जान देने वाला था तो दूसरा अपनी कमाई के मुख्य भाग को दान-दक्षिणा में दे देने वाला था।

जब सेठ, सेठानी और उनकी लड़की चले गये, तो घर पर रात के समय विचार-विनिमय होने लगा। फकीरचन्द ने माँ को अपने मन का संदेह बता दिया। उसने कहा, ‘‘माँ ! मुझको तो यह बेल मेंढ़े चढ़ती दिखाई देती नहीं। मुझे यह संदेह हो रहा है कि सेठ ने अपने खेतों का प्रबन्ध कराने के लिए यह सगाई की बात चला दी है।’’

माँ इस संदेह को सुनकर गम्भीर हो गई। उसने कहा, ‘‘भगवान् करे ऐसा न हो। सेठजी के मन में क्या है, सो तो मैं जानती नहीं; परन्तु ललिता की माँ ने तो सगाई की बात उस समय चलाई थी, जब खेतों का काम तुमको देने की कोई बात नहीं थीं।’’

इसपर बिहारीलाल ने अपना अनुमान बता दिया–‘‘भैया ! यदि यह बात है तो ललिता बिचारी विष खाकर मर जायेगी। वह अति भावुक लड़की है। वह अपने मन में आपका वरण कर चुकी है और आपको मन से निकाल सकना उसके लिए कठिन हो जायेगा।’’

‘‘यह सब व्यर्थ की बात है।’’ फकीरचन्द ने कह दिया, ‘‘वह क्या करेगी और क्या नहीं करेगी, यह हमारे सोचने का विषय नहीं हूँ। मैं तो यह समझता हूँ कि सेठ ने मुझको लड़की की सगाई का लालच देकर अपने खेतों के प्रबन्ध का आयोजन कर लिया है।’’

इसपर भी फकीरचन्द सेठ के जंगल की कटाई का प्रबन्ध करने लगा। अभी काम एक सप्ताह भी नहीं चल सका था कि वर्षा आरम्भ हो गई और कटाई का काम बन्द हो गया। मोतीराम ने आकर बता दिया कि उसने लकड़हारों को छुट्टी दे दी है। इससे फकीरचन्द को विस्मय हुआ। उसने कहा, ‘‘मोतीराम ! काम बन्द कर दिया है और नौकरों को काम से निकाल दिया है तो अपना क्या करोगे?’’

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