|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मैं क्या कर सकता हूँ?’’
‘‘मैं यह पूछ रहा हूँ कि तुम अपना वेतन भी लोगे अथवा नहीं?’’
‘‘लूँगी नहीं तो खाऊंगा कहाँ से?’’
‘‘मैं यह पूछ रहा हूँ कि जिनको तुमने माहवारी के हिसाब से नौकर रखा था, वे अब कहाँ से खाएँगे?’’
‘‘तो बाबू ! आपका मतलब है कि व्यर्थ में उनको वेतन दिया जाये?’’
‘‘ऐसे ही, जैसेकि बिना काम के तुम वेतन लेना चाहते हो।’’
‘मेरी बात और उनकी बात भिन्न-भिन्न है।’’
‘‘क्या भिन्नता है तुममें और उनमें? देखो, मैं समझता हूँ कि उनको काम पर आने दो। इस मौसम में जंगल नहीं कट सकता, तो उनके लिए कोई और काम ढूँढ़ो। काम लेते रहो और वेतन देते रहो।’’
‘‘तो आप कोई काम बता दें, मैं उनको अभी बुला लाता हूँ।’’
‘‘हाँ, कल से पुनः काम पर आना चाहिए। देखो, जंगल के पश्चिम की ओर दस बीघा के लगभग खाली जगह है, जो ऊँची-नीची है। उसको समतल कराना आरम्भ कर दो। मैं समझता हूँ कि इन दो महीनों में यह भूमि समतल हो जायेगी और इसी वर्ष हम उसमें कुछ बो सकेंगे।’’
‘‘पानी के बिना उस ऊँची भूमि में क्या बो सकते हैं हम?’’
‘‘यह विचार करना तुम्हारा काम नहीं है। तुमको जैसा मैं कहता हूँ, करना चाहिए।’’
|
|||||

i 









