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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


मोतीराम को यह बात पसन्द नहीं थी। इस कारण जहाँ उसने निकाले हुए आदमियों को वापस बुला लिया, वहाँ एक लम्बा-चौड़ा पत्र सेठजी को लिख दिया। फकीरचन्द के मस्तिष्क में एक योजना थी। वह उस ऊँची भूमि पर कपास की खेती कराना चाहता था। कपास पानी कम माँगती है और जो कुछ पानी चाहिए था, वह अपने ही पम्प से वहाँ पहुँचाने की योजना बनाने लगा। यूँ तो उसका विचार था कि एक पम्प सेठजी की भूमि की ओर नदी के किनारे लगवायेगा, परन्तु इस दस बीघा के लिए तो यह नदी के इस किनारे से ही पानी भेजने के लिए विचार करने लगा था।

अगले ही दिन ललितपुर के उस दुकानदार को, जिसने उसका पम्प और इन्जिन लगाया था, उसने लिख दिया कि वे अपने इन्जीनियर को एक दिन के लिए भेज दें।

अभी भूमि समतल हो रही थी कि एक बड़ा कैनवस का पाइप नदी के पार से उस पार तक ले जाने के लिए लगा दिया गया और ऊँची भूमि तक पहुँचा दिया गया। इस प्रबन्ध को देख मोतीराम चकित रह गया। उसने सेठ को इस प्रबन्ध के विषय में भी लिख दिया।

वर्षाकाल तक तो किसी प्रकार की आय नहीं हुई। इसके उपरान्त कटाई आरम्भ कर दी गई, और माधो तथा चौधरी को उधर की लकड़ी बेचने के लिए भी कह दिया गया।

समतल भूमि पर कपास बो दी गई। जंगल की लकड़ी के बेचने में कठिनाई यह हुई कि जंगल के इस हिस्से से जरौन रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी और जिखलौन का स्टेशन, जो नदी के इस ओर था, जंगल से बहुत दूर था। फकीरचन्द ने लकड़ी को तैयार कर नदी के पार ले जाने का प्रबन्ध कर दिया। बहुत-सी लकड़ियों को बाँध-बाँधकर तरणी बनाकर पार ले जाने लगे। इस सब में मेहनत तो लगी, परन्तु माल उसी भाव पर बिकने लगा, जिस भाव पर फकीरचन्द का अपना बिक रहा था। इसपर भी रुपया आने में देरी होती गई। मोतीराम इन सब योजनाओं को सेठजी को लिखता रहता था। उसका सबमें एक ही विचार था कि सब प्रबन्ध इतना महँगा हो रहा है कि इसमें आय कुछ नहीं हो सकेगी। इसपर भी फकीरचन्द काम करता जाता था।

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