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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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इस समय बिहारीलाल की परीक्षा हुई और परीक्षा के उपरान्त वह खाली हो गया। एक दिन वह अपनी माँ के सम्मुख फकीरचन्द से कहने लगा, ‘‘भैया ! मैं, जबतक परीक्षफल नहीं निकलता, घूमने के लिए बम्बई जाना चाहता हूँ।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘खाली जो हूँ।’’
‘‘काम तो बहुत रखा है करने को। कल से मेरे साथ खेत में जाना आरम्भ कर दो।’’
‘‘नहीं भैया ! यह परीक्षाफल निकलने के पश्चात् करूँगा। अभी दस वर्ष पढ़ाई के पश्चात् दो महीने का तो अवकाश मिला है। मुझको इन अवकाश के दिनों में भ्रमण करने का अवसर मिलना चाहिए।’’
‘‘मैंने तो परीक्षा के पश्चात् ऐसी कोई छुट्टी नहीं माँगी थी।’’
‘‘भैया ! पिताजी जीवित होते, तो तुम अवश्य माँगते और मिलती भी। मेरे पिता तो जीवित हैं। उनसे ही माँग रहा हूँ।’’
‘‘पिताजी जीवित है? क्या मतलब?’’
‘‘जब भाभी माँ बन गईं तो भैया पिता क्यों नहीं हो गये? मुझको इन दिनों के लिए बम्बई जाने दो। देखो, मैंने भाभी को पत्र लिखा था और उनका उत्तर आ गया है।’’
‘‘क्या उत्तर आया है?’’
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