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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘वे लिखती हैं कि मेरा पत्र माताजी को दिखाया था। उन्होंने कहा है कि बम्बई में आना है, तो उनके घर में ही ठहरूँ। मुझे उनको सूचित करना चाहिए कि किस गाड़ी से और किस दिन वहाँ पहुँच रहा हूँ, जिससे वे स्टेशन पर मोटर भेज सकें।’’
फकीरचन्द गम्भीर विचार में पड़ गया। वह विचार करता था कि इसका क्या परिणाम हो सकता है। उसको बिहारीलाल में अपनी बात पूरी करने की प्रबल इच्छा का पहली बार दर्शन हुआ। वह इस इच्छा के होने और उसको पूरा करने में तत्लीनता से रुष्ट नहीं था, परन्तु वह इससे अनिष्ट होने की आशंका पर विचार कर रहा था। माँ ने फकीरचन्द को चिन्ता में देख पूछ लिया, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’
‘‘यही कि कच्ची रिश्तेदारी में कुछ बिगाड़ न हो जाये।’’
‘‘बेटा ! बिगाड़ होना है तो कच्ची में ही हो जाना ठीक है। जब सम्बन्ध अटूट हो गया, तब तो बिगाड़ बहुत ही दुःखदायक होगा। यदि सम्बन्ध टूटना है तो अभी टूट जाना ठीक होगा।’’
बिहारीलाल को जाने के समय फकीरचन्द ने तीन सौ रुपये खर्च करने के लिए दिये। माँ ने यह कहा ‘‘देखो बिहारी ! कोई झगड़े वाली बात न करना। यदि कोई ऐसी बात कहे, जो पसन्द न हो तो उत्तर देना ठीक नहीं। तुम छोटे हो। तुमको चुप रहना चाहिए। ललिता से बहुत हँसी-ठट्ठा मत करना। यहाँ की बात दूसरी थी। वहाँ कोई गलत बात समझ लेगा तो ठीक नहीं होगा।
‘‘उस पर भी यदि कोई बात असह्म हो तो झगड़ा करने की अपेक्षा वहाँ से चला आना ठीक है।’’
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