|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
वास्तव में इन सब सावधानियों का कारण यह था कि फकीरचन्द और उसकी माँ के मन में यह बात बैठी हुई थी। कि यह सगाई टिकी रह नहीं सकती। वे अपने और सेठ के आर्थिक स्तर में बहुत बड़ा अन्तर समझते थे। जहाँ तक लड़की का सम्बन्ध था, वे उसके गुण, कर्म और स्वभाव को देख चुके थे और उन्होंने उसको पसन्द किया था; परन्तु सेठ और उनके सम्बन्धियों के विषय में वे सदा संशय में रहते थे।
बिहारीलाल बम्बई पहुँचा तो ललिता की माता अपनी मोटर में उसको लेने स्टेशन पर पहुँची हुई थी। बिहारीलाल ने स्टेशन पर ही ललिता की माँ के चरण स्पर्श किये, तो उसने आशीर्वाद दिया और उसको लेकर घर आ गई।
मकान में घुसते ही सामने रामचन्द के दर्शन हुए। बिहारीलाल ने देखा तो हाथ जोड़ जय राम जी की’ कह दी। रामचन्द सिर हिलाकर मुस्कराया, परन्तु वह उसके यहाँ आने का कारण समझ नहीं सका। बिहारी के पीछे-पीछे माँ को आते देख तथा नौकर को एक बिस्तर और ट्रंक उठाकर लाते देख, दुकान जाने के स्थान वह वापस उनके पीछे लौट आया और बिहारीलाल के साथ-साथ सेठजी के कमरे में पहुँच गया। सेठजी ने बहुत ही आदर से उसको अपने समीप बैठाया और फकीरचन्द तथा उसकी माता का कुशल समाचार पूछा।
बिहारी ने सब प्रश्नों का एक ही वाक्य में उत्तर दे दिया–सब भगवान् की कृपा है। आपका स्वास्थ्य तो ठीक है !’’ इसके उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही उसने रामचन्द्र से पूछ लिया, ‘‘कैसे हो दादा राम ! शतरंज चलती है यहाँ भी !’’
‘‘अच्छा जाओ, स्नानादि से छुट्टी पा अपनी माता तुल्य भाभी के हाथ का बना अल्पाहार कर लो।’’ इतना कह सेठ हँस पड़ा।
|
|||||

i 









