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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल भी हँसने लगा। उसने उठते हुए कहा, ‘‘पिता जी ! उनको भूल नहीं सकता। चलो राम भैया ! बता दो कहाँ चलना चाहिए।’’

विवश राम को उठकर उसका मार्ग-प्रदर्शन करने जाना पड़ा। वह उसको माँ के कमरे में ले गया। वहाँ माँ ने कहा, ‘‘राम !’’ बिहारी को अपने बगल वाले कमरे में ले जाओ। वहाँ इसका सामान गया है। देखो, इसको स्नानागार दिखना देना; जिससे यह स्नानादि से निवृत्त हो जाये। मैं अल्पाहार भेज रही हूँ।’’

राम उसको वहाँ ले गया, जहाँ माँ ने बताया था। वहाँ ललिता बिहारी को बिस्तर खुलवा कर सामान ठीक करवा रही थी। बिहारी ने ललिता को देखा तो उसके चरण स्पर्श करने के लिए झुका। ललिता कुछ पीछे हट गई। इसपर बिहारी ने कह दिया, ‘‘भाभी ! पाय लागूँ।

राम हँस पड़ा। ललिता को लज्जा लगी तो राम को बोली, ‘‘भैया ! अब तुम आ गए हो, सो तुम देख लेना।’’ यह कहकर वह चली गई।

राम ने हँसकर कहा, ‘‘पर भाभी ने आशीर्वाद तो दिया ही नहीं।’’

‘‘राम भैया ! तुम कुछ ऊँचा सुनते प्रतीत होते हो। भाभी ने आशीर्वाद तो दिया है।’’

‘‘क्या दिया है?’’

‘‘वे जाती हुई कह गई हैं कि भगवान् करे मेरी और राम भैया की गहरी मित्रता हो जाये।’’

‘‘इसकी क्या आवश्यकता है?’’

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